झांसी: पितृ पक्ष के दौरान अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने की परंपरा के बीच झांसी में एक अनोखी पहल सामने आई है। यहां अनाथ, अज्ञात और लावारिस दिवंगतों के साथ-साथ 878 परिवारों के पूर्वजों के लिए सामूहिक पिंड पूजन कराया गया। इसके बाद इन पिंडों को गया जी ले जाकर विधि-विधान से अर्पित करने के लिए आठ सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल रवाना हुआ।
यह आयोजन जिला जनकल्याण महासमिति और रानी झांसी फाउंडेशन की ओर से डॉ. जितेंद्र कुमार तिवारी के संयोजन में किया गया। आयोजन का उद्देश्य उन परिवारों की मदद करना बताया गया, जो धार्मिक, शारीरिक या आर्थिक कारणों से गया जी जाकर पिंडदान नहीं कर सकते।
पहुज नदी तट पर हुआ सामूहिक पिंड पूजन
रिपोर्ट के मुताबिक, झांसी के सीपरी बाजार के पास पहुज नदी के तट पर धर्माचार्यों की मौजूदगी में सामूहिक तर्पण और पिंड पूजन कराया गया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने अपने दिवंगत परिजनों के नाम और गोत्र का स्मरण करते हुए धार्मिक अनुष्ठान पूरा किया।
आयोजन में उन दिवंगत लोगों के लिए भी प्रार्थना की गई, जिनका कोई अपना नहीं है। आयोजकों के मुताबिक, लावारिस और बेसहारा दिवंगतों को भी श्रद्धांजलि और सम्मान मिलना सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
878 परिवारों ने दी अपने पूर्वजों की जानकारी
इस बार कुल 878 परिवारों ने अपने दिवंगत परिजनों से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई। इनमें ऐसे परिवार भी शामिल हैं जो किसी कारण से गया जी नहीं जा पा रहे हैं।
इन परिवारों के पूर्वजों के लिए झांसी में पिंड पूजन किया गया। अब इन पवित्र पिंडों को गया जी ले जाकर धार्मिक विधि के अनुसार अर्पित किया जाएगा।
आठ सदस्यीय दल गया जी के लिए रवाना
28 सितंबर की सुबह आठ सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल चंबल एक्सप्रेस से गया जी के लिए रवाना हुआ। दल अपने साथ पूजित पिंड लेकर गया है, जिन्हें वहां निर्धारित धार्मिक विधि-विधान के अनुसार अर्पित किया जाएगा।
इस पहल के जरिए आयोजकों ने उन लोगों को भी पितृ पक्ष की परंपरा से जोड़ने का प्रयास किया है, जो दूरी, आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य या पारिवारिक परिस्थितियों के कारण गया जी नहीं पहुंच सकते।
कई वर्षों से जारी है यह सेवा
आयोजक डॉ. जितेंद्र कुमार तिवारी के मुताबिक, बेसहारा और लावारिस दिवंगतों के लिए गया जी जाकर पिंडदान कराने का सेवा-संकल्प पिछले कई वर्षों से जारी है। उनका कहना है कि समाज की संवेदना केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन दिवंगत लोगों के प्रति भी सम्मान होना चाहिए जिनका कोई अपना मौजूद नहीं है।
महिलाओं ने भी जताया आभार
इस पहल से जुड़े परिवारों की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई। स्थानीय महिला प्रतिमा ओझा ने इसे सराहनीय पहल बताया। वहीं अनीता सिंह ने बताया कि उनके घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं होने के कारण उन्होंने अपने पूर्वजों के पिंडदान के लिए इस व्यवस्था की मदद ली।
उनके मुताबिक, इस व्यवस्था के कारण परिवार के लिए गया जी जाना संभव नहीं होने के बावजूद पूर्वजों के लिए धार्मिक अनुष्ठान कराया जा सका।
पितृ पक्ष में गया और प्रयागराज में भी उमड़ते हैं श्रद्धालु
पितृ पक्ष के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। इस वर्ष पितृ पक्ष 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक चल रहा है। प्रयागराज और गया जैसे धार्मिक स्थलों पर भी इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की तैयारियां की गई हैं।
गया में पितृपक्ष से जुड़ा धार्मिक आयोजन लंबे समय से श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं प्रयागराज में भी संगम पर पिंडदान और तर्पण की परंपरा निभाई जाती है।
श्रद्धा के साथ सामाजिक संवेदना का संदेश
झांसी में हुआ यह आयोजन धार्मिक परंपरा के साथ सामाजिक संवेदना का संदेश भी देता है। खासतौर पर उन परिवारों के लिए यह पहल महत्वपूर्ण है, जो किसी कारण से प्रमुख तीर्थस्थलों तक नहीं पहुंच पाते।
878 परिवारों के पूर्वजों के लिए सामूहिक पिंड पूजन और फिर पिंडों को गया जी ले जाने की यह पहल पितृ पक्ष के दौरान श्रद्धा, सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी को एक साथ सामने लाती है।