गाजीपुर: उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में कुछ ऐसे मुस्लिम परिवार हैं, जो खुद को उन पूर्वजों का वंशज बताते हैं जिन्होंने करीब 350 साल पहले इस्लाम धर्म अपनाया था। इन परिवारों के मुताबिक, आज वे इस्लाम की धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं और पांच वक्त की नमाज पढ़ते हैं, लेकिन उनके परिवारों में कई हिंदू रीति-रिवाज और सामाजिक परंपराएं आज भी जारी हैं।
शादी में आज भी निभाई जाती हैं कई पुरानी रस्में
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, गाजीपुर के दिलदारनगर क्षेत्र और आसपास के गांवों में कुछ मुस्लिम परिवारों की शादियों में ऐसी रस्में देखने को मिलती हैं, जिनकी जड़ें उनके बताए पारिवारिक हिंदू रीति-रिवाजों से जुड़ी हैं।
इन परिवारों के अनुसार, शादी के दौरान हल्दी, वरछेका और माड़ो गाड़ने जैसी रस्में होती हैं। नई दुल्हन के ससुराल पहुंचने पर परछावन और चावल फेंकने की रस्म भी कुछ परिवारों में निभाई जाती है।
दुल्हन पहनती है लाल जोड़ा, गृह प्रवेश की भी अलग परंपरा
रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ परिवारों में नवविवाहित महिलाएं शादी के बाद लाल जोड़ा पहनती हैं। ससुराल में गृह प्रवेश के समय दउरी में पैर रखने की रस्म भी निभाई जाती है।
इन परिवारों में माथे पर सिंदूर की जगह चंदन लगाने और ढोलक की थाप पर पारंपरिक गीत गाने का चलन भी बताया गया है। महिलाओं के साड़ी और पुरुषों के कुर्ता-धोती पहनने की परंपरा का भी उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है।
दिलदारनगर और आसपास के गांवों में ऐसे परिवार
रिपोर्ट के अनुसार, गाजीपुर के दिलदारनगर क्षेत्र की ग्राम पंचायत उसिया की आबादी करीब 40 हजार बताई गई है, जिसमें लगभग 24 हजार मुस्लिम आबादी है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, आसपास के करीब 12 से 14 गांवों में ऐसे मुस्लिम परिवार हैं जो अपने पूर्वजों को हिंदू वंश से जुड़ा बताते हैं और कुछ पारिवारिक रीति-रिवाज आज भी निभाते हैं।
पूर्वजों को लेकर अलग-अलग परिवारों की मान्यताएं
रेलवे से सेवानिवृत्त ट्रांसपोर्ट निरीक्षक औरंगजेब खान ने रिपोर्ट में अपने परिवार की वंश परंपरा के बारे में जानकारी दी। उनके अनुसार, बहुत पहले फतेहपुर सीकरी से सैनूमल, पूरनमल और नरहरदेव नाम के लोग गाजीपुर क्षेत्र में आए थे। परिवार की मान्यता के मुताबिक नरहरदेव ने बाद में इस्लाम धर्म अपनाया था।
वहीं व्यापारी रियाज खान ने खुद को सिकरवार गोत्र से जुड़ा बताया और दावा किया कि उनके पूर्वज कुंअर नवल सिंह ने मुगलकाल में इस्लाम कबूल किया था। उनके अनुसार, इसके बाद उनका नाम दीनदार खान हो गया और दिलदारनगर का नाम भी इसी से जुड़ा माना जाता है।
इन वंश संबंधी दावों की पुष्टि के लिए अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों और दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच आवश्यक होगी।
यूपी-बिहार के परिवारों का होता है सामूहिक भोज
रिपोर्ट में उसिया के निवर्तमान प्रधान शम्स तबरेज खां के हवाले से बताया गया है कि धर्मांतरित मुस्लिम परिवारों की ओर से एक-दो साल के अंतराल पर सामूहिक भोज आयोजित किया जाता है।
इसमें उत्तर प्रदेश और बिहार के ऐसे परिवार शामिल होते हैं। बताया गया है कि कमसार क्षेत्र से ही करीब 700 हिंदू और मुस्लिम लोग ऐसे आयोजनों में हिस्सा लेते हैं। आयोजकों के अनुसार, इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को अपने पारिवारिक इतिहास और पूर्वजों से जोड़ना है।
‘नमाज पढ़ते हैं, मगर पूर्वजों को नहीं छोड़ सकते’
स्थानीय परिवारों का कहना है कि धार्मिक पहचान के साथ उनकी पारिवारिक और सांस्कृतिक परंपराएं भी बनी हुई हैं। शम्स तबरेज खां के मुताबिक, परिवार अपने धार्मिक विश्वासों का पालन करते हैं, लेकिन अपने पूर्वजों की परंपराओं को भी अपनी विरासत का हिस्सा मानते हैं।
इतिहास पर शोध करने वाले नसीम रजा ने भी बताया वंश का दावा
अल दीनदार शम्सी म्यूजियम एंड रिसर्च सेंटर के निदेशक डॉ. कुंअर मुहम्मद नसीम रजा सिकरवार ने रिपोर्ट में दावा किया कि कुंअर नवल सिंह ने 1678 में इस्लाम धर्म अपनाया था।
उन्होंने कहा कि वह करीब 20 वर्षों से इस विषय पर शोध कर रहे हैं और दिलदारनगर में ऐसे करीब 50 मुस्लिम परिवार हैं जो खुद को कुंअर नवल सिंह उर्फ दीनदार खान के वंशज बताते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ परिवारों में आज भी हिंदू विवाह संबंधी रस्में देखने को मिलती हैं।
गाजीपुर का आधिकारिक जिला इतिहास भी इस क्षेत्र को प्राचीन और मध्यकालीन दौर से जुड़े लंबे ऐतिहासिक विकास वाला क्षेत्र बताता है और मुगलकाल में इसके महत्व का उल्लेख करता है। हालांकि, अमर उजाला की रिपोर्ट में बताए गए विशिष्ट वंश और धर्मांतरण के दावों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि इस स्रोत से नहीं होती।
कार्ड पर भी लिखवाया वंश का नाम
रिपोर्ट में एक और उदाहरण का उल्लेख है। डॉ. नसीम रजा के अनुसार, जौनपुर के डेहरी गांव के नौशाद अहमद ने अपनी बेटी के दावते वलीमा के कार्ड पर अपना नाम ‘नौशाद अहमद दूबे’ लिखवाया था। वह खुद को 1669 में जमींदार रहे लाल बहादुर दूबे की आठवीं पीढ़ी का वंशज बताते हैं।
गाजीपुर के इन परिवारों की कहानी बताती है कि धार्मिक पहचान के साथ किसी समुदाय की पारिवारिक स्मृतियां, सामाजिक रिश्ते और सांस्कृतिक परंपराएं लंबे समय तक अलग-अलग रूपों में बनी रह सकती हैं। हालांकि इनके ऐतिहासिक दावों को समझने के लिए परिवारों की मौखिक परंपराओं के साथ उपलब्ध दस्तावेजी स्रोतों की भी जांच जरूरी है।