संभल: नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़े मामले में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। पुलिस और जांच एजेंसियों द्वारा कथित मुख्य साजिशकर्ता बताए गए शारिक सठा अभी भी फरार हैं, जबकि उनके कथित सहयोगी मुल्ला अफरोज को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जेल से रिहा कर दिया गया है।
29 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई निवारक हिरासत को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि हिरासत के लिए इस्तेमाल की गई सामग्री कानूनी कसौटी पर पर्याप्त नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का खर्च भी लगाया।
शारिक सठा पर क्या आरोप हैं?
संभल हिंसा की जांच के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस ने शारिक सठा को मामले का कथित मुख्य साजिशकर्ता बताया था। पुलिस के अनुसार, हिंसा की साजिश में उसकी भूमिका सामने आई और उसके कथित सहयोगियों की गिरफ्तारी के बाद जांच आगे बढ़ी।
पुलिस की चार्जशीट से संबंधित रिपोर्टों में सठा को दुबई में रहने वाला फरार आरोपी बताया गया है। अगस्त 2026 में उसके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी किए जाने और उसकी तलाश में इंटरपोल की मदद लेने की प्रक्रिया की जानकारी भी सामने आई थी।
हालांकि, शारिक सठा के खिलाफ लगाए गए आरोपों का अंतिम न्यायिक निर्धारण अभी बाकी है।
कौन हैं मुल्ला अफरोज?
मुल्ला अफरोज को पुलिस ने संभल हिंसा से जुड़े मामलों में आरोपी बनाया था। वह जनवरी 2025 में गिरफ्तार हुआ था और बाद में उसके खिलाफ NSA के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी किया गया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, अफरोज को 17 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किया गया था। बाद में 13 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ NSA के तहत हिरासत का आदेश पारित हुआ।
अफरोज ने इस हिरासत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन जून 2026 में हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने NSA हिरासत क्यों रद्द की?
सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर को अपने फैसले में अफरोज की निवारक हिरासत को रद्द कर दिया। अदालत ने विशेष रूप से हिरासत के आधार के रूप में इस्तेमाल की गई सामग्री की कानूनी पर्याप्तता पर सवाल उठाया।
फैसले में अदालत ने कहा कि CCTV और वीडियो रिकॉर्डिंग को हिरासत के आधार में महत्वपूर्ण बताया गया था, लेकिन वे रिकॉर्ड आरोपी को उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में शामिल नहीं थे और अदालत के सामने भी पेश नहीं किए गए।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी चार्जशीट का दाखिल होना अपने आप में आरोपी की दोषसिद्धि या अपराध में भागीदारी का अंतिम प्रमाण नहीं है।
10 लाख रुपये का खर्च भी लगाया
सुप्रीम कोर्ट ने अफरोज की हिरासत को रद्द करने के साथ उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का खर्च लगाया। अदालत ने माना कि हिरासत आदेश को कानूनी आधार पर कायम नहीं रखा जा सकता।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके फैसले में की गई टिप्पणियों का असर अफरोज के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों के गुण-दोष पर नहीं पड़ेगा। वे मामले कानून के अनुसार आगे जारी रहेंगे।
करीब 20 महीने बाद जेल से बाहर आया अफरोज
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुल्ला अफरोज जेल से बाहर आया और अपने घर पहुंचा। रिपोर्टों के अनुसार, उसने करीब 20 महीने जेल में बिताए थे।
रिहाई के बाद उसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अपने लिए न्याय बताया। उसके घर लौटने के बाद पुलिस उसकी गतिविधियों पर नजर रख रही है।
क्या था संभल हिंसा का मामला?
24 नवंबर 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा भड़क गई थी। इस घटना में चार लोगों की मौत हुई थी और पुलिसकर्मियों समेत कई लोग घायल हुए थे। घटना के बाद कई FIR दर्ज की गईं और बड़ी संख्या में लोगों को आरोपी बनाया गया।
पुलिस की जांच में शारिक सठा समेत कई लोगों की भूमिका की जांच की गई। 2025 में दाखिल चार्जशीट से संबंधित रिपोर्टों में पुलिस ने सठा को हिंसा की साजिश से जोड़ते हुए उसे कथित मुख्य साजिशकर्ता बताया था।
शारिक सठा की तलाश जारी
अगस्त 2026 में अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, शारिक सठा के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी किया गया था और पुलिस उसकी तलाश में इंटरपोल की मदद लेने की तैयारी कर रही थी। रिपोर्ट में उसके दुबई में होने की जानकारी का भी उल्लेख किया गया था।
इस तरह एक तरफ जांच एजेंसियां कथित मुख्य साजिशकर्ता की तलाश में हैं, वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मुल्ला अफरोज NSA की हिरासत से बाहर आ चुका है।
आगे क्या होगा?
मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत रद्द होने का अर्थ यह नहीं है कि उसके खिलाफ सभी आपराधिक मामले समाप्त हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया है कि संबंधित आपराधिक मुकदमे कानून के अनुसार आगे चलेंगे।
वहीं शारिक सठा के खिलाफ चल रही जांच और उसकी तलाश आगे भी जारी रहने की बात सामने आई है। संभल हिंसा से जुड़े मामलों में अदालतों में चल रही कार्यवाही के आधार पर आने वाले समय में तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।