लखनऊ: पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का असर अब उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में सड़क निर्माण पर भी दिखाई देने लगा है। सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाले बिटुमिन यानी डामर की कीमत कुछ ही महीनों में करीब दोगुनी हो गई है। कीमत बढ़ने के साथ इसकी आपूर्ति भी प्रभावित हुई है, जिसके चलते प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत प्रदेश में 68 सड़कों के करीब 650 किलोमीटर निर्माण कार्य अटक गया है।
अमर उजाला की 2 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, सड़क निर्माण कंपनियों का कहना है कि बिटुमिन की कीमत बढ़ने और उपलब्धता घटने से तय दरों पर ग्रामीण सड़क परियोजनाओं को पूरा करना मुश्किल हो रहा है। वहीं, लोक निर्माण विभाग की कुछ परियोजनाओं को बढ़ी लागत के लिए मूल्य समायोजन की राहत मिल चुकी है, लेकिन ग्रामीण सड़क परियोजनाओं के लिए ऐसी व्यवस्था का इंतजार है।
फरवरी में 52 हजार, जून तक पहुंचा एक लाख रुपये प्रति टन
सड़क निर्माण कंपनी एआर थर्मोस्टेट्स के निदेशक सिद्धार्थ गुप्ता के अनुसार, फरवरी 2026 में बिटुमिन की कीमत करीब 52 हजार रुपये प्रति टन थी। जून तक यह बढ़कर लगभग एक लाख रुपये प्रति टन हो गई।
यानी कुछ ही महीनों में सड़क निर्माण की इस महत्वपूर्ण सामग्री की कीमत लगभग दोगुनी हो गई। कीमत बढ़ने के साथ-साथ बाजार में उपलब्धता का संकट भी गहराया है। रिपोर्ट के अनुसार तेल कंपनियों से बिटुमिन की आपूर्ति करीब आधी रह गई है और कई राज्यों में अधिक कीमत देने के बावजूद पर्याप्त माल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
68 सड़कों का करीब 650 किलोमीटर काम प्रभावित
बिटुमिन संकट का सीधा असर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की परियोजनाओं पर पड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार 68 ग्रामीण सड़कों का लगभग 650 किलोमीटर निर्माण प्रभावित हुआ है।
ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कें गांवों को बाजार, स्कूल, अस्पताल और प्रमुख मार्गों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में निर्माण कार्य में देरी होने से इन परियोजनाओं के पूरा होने की समयसीमा भी प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, किसी विशेष सड़क के कितने समय तक रुकने या कब दोबारा शुरू होने की स्थिति परियोजना और बिटुमिन की उपलब्धता पर निर्भर करेगी।
पश्चिम एशिया के संघर्ष से कैसे बढ़ा संकट?
रिपोर्ट में बिटुमिन की आपूर्ति पर पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के असर का उल्लेख किया गया है। भारत में बिटुमिन की करीब 30 से 40 प्रतिशत जरूरत आयात से पूरी होती है। संघर्ष के बाद आयात प्रभावित होने से घरेलू बाजार में उपलब्धता और कीमत दोनों पर दबाव पड़ा।
पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2026 में भारत ने 2.36 लाख टन बिटुमिन का आयात किया था।
इस तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार और आपूर्ति श्रृंखला में होने वाले बदलावों का असर सड़क निर्माण जैसी स्थानीय परियोजनाओं की लागत पर भी पड़ सकता है।
पीडब्ल्यूडी परियोजनाओं को मिल चुकी है मूल्य समायोजन की राहत
बिटुमिन की कीमत में तेज वृद्धि के बीच उत्तर प्रदेश में कुछ लोक निर्माण विभाग यानी PWD परियोजनाओं के लिए राहत की व्यवस्था की गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, मई में उन PWD परियोजनाओं की बढ़ी हुई बिटुमिन लागत वहन करने का फैसला किया गया, जिनकी निविदा 1 अप्रैल से पहले हुई थी और जिनमें मूल्य वृद्धि का प्रावधान नहीं था। इसके बाद कई रुके हुए काम दोबारा शुरू हो सके।
हालांकि, PMGSY की ग्रामीण सड़क परियोजनाओं के ठेकेदारों का कहना है कि उन्हें भी इसी तरह की व्यवस्था की जरूरत है।
ग्रामीण सड़क ठेकेदारों की क्या मांग है?
ग्रामीण सड़क निर्माण से जुड़े ठेकेदारों के मुताबिक PMGSY के ठेके अपेक्षाकृत छोटे और निश्चित दर वाले होते हैं तथा इनमें मुनाफे की गुंजाइश सीमित रहती है।
ऐसे में बिटुमिन की कीमत लगभग दोगुनी होने पर अतिरिक्त लागत सीधे ठेकेदारों की कार्यशील पूंजी पर पड़ रही है। उनका कहना है कि सरकार को बढ़ी कीमत और तय दर के बीच के अंतर का भुगतान करने की व्यवस्था करनी चाहिए।
ठेकेदारों ने तीन प्रमुख मांगें सामने रखी हैं:
- बिटुमिन की बढ़ी कीमत का मूल्य अंतर उपलब्ध कराया जाए।
- ग्रामीण सड़क परियोजनाओं के लिए पर्याप्त बिटुमिन की आपूर्ति सुनिश्चित हो।
- आपूर्ति संकट से हुई देरी के लिए बिना दंड समय विस्तार दिया जाए।
छोटे ठेकेदारों पर भी पड़ सकता है असर
बिटुमिन की कीमत और आपूर्ति का संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर केवल परियोजनाओं की समयसीमा तक सीमित नहीं रह सकता।
ग्रामीण सड़क ठेकेदारों का दावा है कि लगातार बढ़ती लागत और सीमित मार्जिन के कारण छोटे ठेकेदार इन परियोजनाओं से बाहर हो सकते हैं। इससे ग्रामीण सड़क निर्माण की प्रतिस्पर्धा और परियोजनाओं को पूरा करने की क्षमता पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। यह ठेकेदारों की ओर से व्यक्त किया गया दावा है।
गांवों की सड़कों पर संकट का सीधा असर
ग्रामीण सड़क परियोजनाएं केवल सड़क बनाने तक सीमित नहीं होतीं। इनके माध्यम से गांवों को आसपास के कस्बों और शहरों से जोड़ने में मदद मिलती है।
निर्माण कार्य लंबे समय तक प्रभावित रहने पर ग्रामीण इलाकों में आवागमन, कृषि उत्पादों की आवाजाही और स्थानीय व्यापार से जुड़ी गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि इन प्रभावों की वास्तविक सीमा परियोजनाओं के स्थान और देरी की अवधि पर निर्भर करेगी।
आगे राहत की उम्मीद मूल्य समायोजन और आपूर्ति पर
अब ग्रामीण सड़क परियोजनाओं के लिए मुख्य सवाल यह है कि बढ़ी हुई बिटुमिन लागत का बोझ किस तरह संभाला जाएगा और पर्याप्त सामग्री की आपूर्ति कब सामान्य होगी।
यदि मूल्य समायोजन और आपूर्ति से जुड़ी व्यवस्था समय पर बनती है तो रुके हुए सड़क निर्माण कार्यों को दोबारा गति मिलने की संभावना रहेगी। फिलहाल 68 सड़कों और करीब 650 किलोमीटर निर्माण के प्रभावित होने से ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर लागत और आपूर्ति संकट का दबाव साफ दिखाई दे रहा है।