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38 साल पुराने दुष्कर्म और अपहरण मामले में सुभाष बरी, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द की 1988 की सजा

dbnadmin
DBN विशेष संवाददाता
9 October 2026 12:53 PM 1 मिनट पठन 162 Views
38 साल पुराने दुष्कर्म और अपहरण मामले में सुभाष बरी, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द की 1988 की सजा

Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने करीब 38 साल पुराने अपहरण और दुष्कर्म के मामले में सुभाष को बरी कर दिया है। अदालत ने मेरठ की सत्र अदालत द्वारा 26 सितंबर 1988 को सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। यह फैसला न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने 7 अक्टूबर 2026 को सुनाया।

क्या है 1986 का पूरा मामला?

यह मामला 25 फरवरी 1986 की घटना से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, सुभाष और उसके पिता शेरा कथित तौर पर एक युवती को उसकी बहन की बीमारी का हवाला देकर घर से ले गए थे। अगले दिन, 26 फरवरी 1986 को प्राथमिकी दर्ज कराई गई। रिपोर्टों के मुताबिक, युवती को 11 मार्च 1986 को बरामद किया गया था।

मामले की सुनवाई मेरठ की सत्र अदालत में हुई। अदालत ने 26 सितंबर 1988 को सुभाष को भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 366 और 376 के तहत दोषी ठहराया था। ये धाराएं अपहरण, महिला को विवाह या अवैध यौन संबंध के उद्देश्य से ले जाने और दुष्कर्म से संबंधित थीं। सुभाष ने इस फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट में बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?

अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयानों में कथित कमियों का उल्लेख किया। वकील ने दलील दी कि युवती के शरीर पर चोट के निशान नहीं मिले थे और चिकित्सकीय जांच से दुष्कर्म के आरोप की निश्चित पुष्टि नहीं हुई थी।

बचाव पक्ष ने घटना के बाद की परिस्थितियों और युवती की उम्र को लेकर भी सवाल उठाए। हालांकि, ये बचाव पक्ष की दलीलें थीं; अदालत ने मामले के सभी उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहियों का मूल्यांकन करने के बाद अपना निष्कर्ष दिया।

अभियोजन के साक्ष्यों में क्या कमियां मिलीं?

हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन की कहानी में गंभीर विरोधाभास थे और उपलब्ध मौखिक तथा चिकित्सकीय साक्ष्य आरोपों की पर्याप्त पुष्टि नहीं करते थे। अदालत के अनुसार, अभियोजन पक्ष ऐसा ठोस मामला पेश नहीं कर पाया, जिसके आधार पर सुभाष की दोषसिद्धि को बरकरार रखा जा सके।

राज्य पक्ष ने अपील का विरोध करते हुए दलील दी थी कि युवती की गवाही विश्वसनीय थी और उसके बयान के आधार पर सजा कायम रखी जा सकती थी। इसके बावजूद हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की समीक्षा के बाद अपील स्वीकार कर ली।

अदालत ने युवती की उम्र पर भी किया विचार

समाचार रिपोर्टों के मुताबिक, मेडिकल रिकॉर्ड में युवती की उम्र 19 वर्ष से अधिक बताई गई थी। अदालत ने घटना से जुड़ी परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करते हुए सहमति की संभावना पर भी टिप्पणी की।

हालांकि, अदालत के फैसले को केवल मेडिकल रिपोर्ट या चोटों के अभाव के आधार पर समझना सही नहीं होगा। हाई कोर्ट ने अभियोजन के पूरे मामले, गवाहों के बयानों और अन्य साक्ष्यों की समीक्षा की थी। अदालत का निष्कर्ष इस विशेष मामले के रिकॉर्ड पर आधारित था।

सुभाष को मिली क्या राहत?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुभाष की अपील स्वीकार करते हुए 1988 की दोषसिद्धि रद्द कर दी और उसे संबंधित आरोपों से बरी कर दिया। रिपोर्टों के अनुसार, मुकदमे के दौरान सुभाष जमानत पर था। इसलिए अदालत ने उसे आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता से छूट दी और उसके जमानतदारों को भी जिम्मेदारी से मुक्त करने का निर्देश दिया।

38 साल बाद आया फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

यह मामला आपराधिक न्याय प्रक्रिया में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और अपीलीय समीक्षा के महत्व को सामने लाता है। किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पक्ष को आरोपों को कानूनी मानक के अनुसार संदेह से परे साबित करना होता है। इस मामले में हाई कोर्ट ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्य दोषसिद्धि बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

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