मुस्कान-साहिल को फांसी कब होगी? हाईकोर्ट से राष्ट्रपति तक तय होंगे कई पड़ाव नीला ड्रम हत्याकांड में जिला अदालत ने सुनाई मृत्युदंड की सजा, हाईकोर्ट की पुष्टि और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद दया याचिका का भी मिलेगा अवसर मेरठ। बहुचर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में पति सौरभ राजपूत की हत्या के मामले में मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को जिला अदालत ने मृत्युदंड की सजा सुनाई है। फैसले के बाद अब शहर में चर्चा है कि दोनों को फांसी कब होगी। हालांकि, जिला अदालत से मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के बाद भी फांसी की तारीख तुरंत तय नहीं होती। इसके लिए न्यायिक समीक्षा, ऊपरी अदालतों में अपील और संवैधानिक दया याचिका समेत कई कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं। पहला पड़ाव: हाईकोर्ट में होगी मृत्युदंड की पुष्टि अभियोजन पक्ष के डीजीसी केके चौबे के मुताबिक, जिला अदालत से मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के बाद मामले को संबंधित हाईकोर्ट में पुष्टि के लिए भेजा जाता है। भारतीय कानून के तहत सत्र न्यायालय द्वारा दी गई मृत्युदंड की सजा हाईकोर्ट की पुष्टि के बिना लागू नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट मामले के रिकॉर्ड, साक्ष्यों और कानूनी पहलुओं की समीक्षा करेगा। बचाव पक्ष को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। हाईकोर्ट सजा की पुष्टि कर सकता है, उसे बदल सकता है या कानून के मुताबिक अन्य आदेश दे सकता है। दूसरा पड़ाव: सुप्रीम कोर्ट में अपील यदि हाईकोर्ट मृत्युदंड की पुष्टि करता है, तो दोषियों के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प होगा। सुप्रीम कोर्ट मामले के तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी आधारों की समीक्षा कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट सजा बरकरार रख सकता है, उसे कम कर सकता है या उचित कानूनी आधार मिलने पर फैसले में बदलाव कर सकता है। इसलिए हाईकोर्ट से पुष्टि होने के बाद भी फांसी को अंतिम और तत्काल कार्रवाई नहीं माना जा सकता। तीसरा पड़ाव: पुनर्विचार और दया याचिका सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलने पर भी दोषियों के पास कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्प हो सकते हैं। इनमें पुनर्विचार याचिका और निर्धारित परिस्थितियों में उपचारात्मक याचिका शामिल हैं। इसके बाद संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दी जा सकती है। राज्यपाल के समक्ष भी अनुच्छेद 161 के तहत संवैधानिक दया का विकल्प लागू कानूनी प्रक्रिया के अनुसार उपलब्ध हो सकता है। दया याचिका पर निर्णय संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया जाता है। यदि दया याचिका स्वीकार होती है, तो मृत्युदंड माफ या कम किया जा सकता है। यदि याचिका खारिज हो जाती है, तब भी कानून के तहत आवश्यक प्रक्रियाओं और निर्धारित समयसीमाओं का पालन करना जरूरी होगा। आखिरी चरण: जेल प्रशासन को जारी होगा डेथ वारंट सभी आवश्यक न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद संबंधित अदालत कानून के मुताबिक मृत्यु वारंट जारी करने और फांसी की तारीख तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाती है। इसके बाद जेल प्रशासन निर्धारित नियमों के अनुसार कार्रवाई करता है। मृत्युदंड के मामलों में दोषियों को कानूनी सहायता और उपलब्ध न्यायिक उपायों का अवसर देना अनिवार्य है। इसलिए यह कहना अभी संभव नहीं है कि मुस्कान और साहिल को किस तारीख को फांसी दी जाएगी। कितना समय लग सकता है? मृत्युदंड के मामलों में ऊपरी अदालतों की सुनवाई, पुनर्विचार याचिकाओं और दया याचिका की प्रक्रिया में लगने वाला समय अलग-अलग हो सकता है। इसमें एक साल, कई साल या इससे अधिक समय भी लग सकता है। अभी दोनों के मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया और अदालतों के फैसले महत्वपूर्ण होंगे। मेरठ में महिला को पहली बार मृत्युदंड इस मामले ने मेरठ में विशेष चर्चा पैदा की है। उपलब्ध खबर के मुताबिक, जिला अदालत से किसी महिला को मृत्युदंड सुनाए जाने का यह मेरठ में पहला मामला बताया जा रहा है। हालांकि, सजा सुनाए जाने और उसे अंतिम रूप से लागू किए जाने के बीच कानूनी रूप से महत्वपूर्ण अंतर है। मुस्कान और साहिल के मामले में आगे का फैसला हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और उपलब्ध संवैधानिक विकल्पों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
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