यह कोई पहला मौका नहीं है, जब भारतीय सुरक्षा बलों और सरकार पर उसकी कार्रवाई को लेकर मानवाधिकार संगठनों ने सवाल उठाया हो। कश्मीर घाटी में आतंकी मासूम खून बहाते रहे, तब मानवाधिकार संगठनों ने कोई सवाल नहीं उठाया, लेकिन जब भी इन आतंकियों के खिलाफ भारतीय बलों ने कड़ी कार्रवाई की, उनके समर्थकों को सीखचों के पीछे डालना शुरू किया, मानवाधिकार संगठनों को उनके मानवाधिकार की चिंता होने लगी। ऐसे में हालिया आंदोलनों के दौरान भारत सरकार की कार्रवाई को लेकर मानवाधिकार संगठन सवाल नहीं उठाते तो ही हैरत होती। नीट परीक्षा के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी के बीस जुलाई के संसद मार्च के दौरान जो हिंसा हुई, उसके खिलाफ अगर सुरक्षा बल, ताकत का इस्तेमाल नहीं करते तो बाद में वे ही सवालों के घेरे में होते। संसद से महज दो सौ मीटर की दूरी पर जिस तरह आंदोलन में शामिल असामाजिक और अराजक तत्व उकसाऊ कार्रवाई कर रहे थे, उसमें पुलिस और प्रशासन के पास बल प्रयोग के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था। दुनिया की उदार से उदार समझी जाने वाली शायद ही कोई सरकार होती, जो अपनी संसद में उपद्रवियों को घुसने की राह देती। सोचिए अगर, उस दिन उपद्रवी संसद में घुस जाते और भारतीय संसद के साथ कुछ वैसी ही अनहोनी होती, जैसा अभी हालिया प्रदर्शन के दौरान अल्बानिया में हुआ है तो क्या भारतीय लोकतांत्रिक समाज उसे स्वीकार कर पाता? निश्चित तौर पर इन सवालों का जवाब सिर्फ ना है। भारत में हालिया आंदोलनों की शुरूआत नीट परीक्षा में धांधली के विरोध में हुई। इसी दौरान अचानक से एक नई पार्टी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ बनी और उसके बैनर तले देशभर के युवाओं ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर डेरा डाल दिया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलनों को शॉक ऑब्जर्बर के रूप में देखा जाता है। मर्यादित आंदोलनों और धरना-प्रदर्शनों के जरिए लोकतांत्रिक समाज अपने गुस्से का इजहार करता रहा है। समझदार सरकारें भी सीमित और मर्यादित आंदोलनों को लोगों के गुस्से की अभिव्यक्ति के प्रतीक के रूप में लेती रही हैं। मर्यादित आंदोलनों के जरिए लोक अपना गुस्सा निकालकर शांत हो जाता है। लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि लोक में अराजक तत्व भी होते हैं और वे आंदोलनों की ताक में रहते हैं। लोकतांत्रिक आंदोलनों में वे मौका पाते ही घुस जाते हैं और अराजकता को बढ़ावा देते हैं। कॉकरोच जनता पार्टी के बीस जुलाई के संसद में मार्च में ऐसा ही हुआ। सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने में जेनुइन छात्रों की संख्या कम, अराजक और असामाजिक तत्वों की संख्या ज्यादा रही। इस तथ्य को सुरक्षा बलों ने भी स्वीकार किया है। बीस जुलाई के संसद मार्च के पहले तक नीट और दूसरी परीक्षाओं में धांधली रोकने की मांग वाला आंदोलन मर्यादित दायरे में था। हालांकि इस दौरान भी शांत खड़े सुरक्षा बलों के साथ बदसलूकी हुई, प्रधानमंत्री को गंदी-गंदी गालियां देते हुए पोस्टर सार्वजनिक रूप से लहराये गए। इन्हें सोशल मीडिया पर उत्तेजित अंदाज में प्रस्तुत भी किया गया। फिर भी सरकारी तंत्र संयमित रहा। सुरक्षा बलों के नरम रूख के पीछे आंदोलन में शामिल युवा रहे। सुरक्षा बलों और प्रशासन को लगता था कि अगर युवाओं के खिलाफ कार्रवाई हुई तो मामला बिगड़ सकता है। लेकिन जैसे ही यह आंदोलन एसआईआर के खिलाफ और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की ओर बढ़ा, इसने राजनीतिक रंग ले लिया। निश्चित तौर पर इस पूरे आंदोलन में छात्र कहीं नेपथ्य में जाते हुए दिखे और मोर्चे पर कांग्रेस की अगुआई में विपक्षी दल दिखे। लेकिन सुरक्षा बलों ने अपना संयम बनाए रखा। चुनाव आयोग पर प्रदर्शन के लिए संसद से निकले विपक्षी सांसदों और उनके समर्थकों को एहतियातन हिरासत में लिया गया। लोगों को जुटने से रोका गया। हो सकता है कि इस दौरान कुछ लोगों के साथ हाथापाई भी हुई हो, किसी को चोट लगी हो। आंदोलन में ऐसा होना स्वाभाविक भी है। दुनिया की कोई भी सरकार आंदोलनकारियों का फूलों से स्वागत नहीं करती। सरकार और सुरक्षा बलों ने जिस तरह संयम दिखाकर सिर्फ हिरासत में लेकर आंदोलन को हिंसक होने से रोकने में सफलता पाई, उसका समाज के एक बड़े हिस्से ने स्वागत भी किया है। आंदोलनकारियों के खिलाफ सड़कों पर उतरी जनता को आसानी से भाजपा का एजेंट कहा जा सकता है। लेकिन त्योहारी मौसम में कारोबारी नुकसान पहुंचा रहे कनॉट प्लेस के कारोबारियों का आंदोलन के विरोध में खड़ा होना मामूली बात नहीं है। इससे साफ हुआ कि जनता भी ऐसे आंदोलनों को पसंद नहीं कर रही। दुर्भाग्य यह है कि चाहे एमनेस्टी इंटरनेशनल हो या फिर ह्यूमनराइट वाच, या संयुक्त राष्ट्र संघ की समिति, उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम, सुरक्षा बलों के संयम, प्रधानमंत्री को दी गई गालियों की ओर ध्यान नहीं दिया। एसआईआर और नीट परीक्षा में धांधली के खिलाफ हुए आंदोलनों के दौरान पुलिस कार्रवाई पर एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र संघ की समिति एवं विशेषज्ञों का चिंता जताना दरअसल मामले का एक तरफा संज्ञान लेना है। ह्यूमन राइट्स वॉच और संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति यानी यूएनसीईआरडी ने अपनी रिपोर्टों में, देश में धार्मिक अल्पसंख्यकोंके खिलाफ भेदभावपूर्ण नीतियां अपनाने और उनके खिलाफ नफरती भाषण आदि का आरोप लगाया है। ये संगठन विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम यानी एफसीआरए और कड़े आतंकवाद-विरोधी कानूनों, मसलन यूएपीए के दुरुपयोग का भी भारत पर आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि इन नियमों-कानूनों के जरिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, एनजीओ और आलोचकों की आवाज दबाई जा रही है। साथ ही, सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे स्वतंत्र पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा सिकुड़ रहा है। मानवाधिकार संगठन चाहे जो भी कहें, लेकिन विशेषकर राजधानी दिल्ली में जिस तरह सुरक्षा बलों ने खुद पर हुए हमलों के बावजूद जवाबी कार्रवाई में संयम दिखाया, उसकी तारीफ होनी चाहिए। दरअसल श्रेष्ठताबोध से ग्रस्त पश्चिमी समाज और उसके कथित मानवाधिकार संगठनों का नजरिया विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों के लिए एकतरफा ही रहा है। बेशक भारत आर्थिक रूप से दुनिया की चौथी बड़ी शक्ति बन चुका है, लेकिन अब भी भारत को लेकर उनकी सोच पुरानी ही है। जिसे अब देश की अधिसंख्य जनता समझने लगी है, इसीलिए अब ऐसे आरोपों और पर्यवेक्षणों से भारतीय मानस उस तरह प्रभावित नहीं होता, जैसा अतीत में होता रहा है। – उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं.
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