Thursday, 20 August 2026

सरधना विधानसभा चुनाव: संगीत सोम के सामने BSP का जाट कार्ड, विनीत भराला से बदला सियासी समीकरण

सरधना विधानसभा चुनाव में विनीत भराला, संगीत सोम और अतुल प्रधान के बीच सियासी मुकाबला

मेरठ, उत्तर प्रदेश: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सरधना विधानसभा सीट पर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व विधायक संगीत सोम, समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधायक अतुल प्रधान और अब बहुजन समाज पार्टी के विनीत भराला के मैदान में आने से मुकाबला त्रिकोणीय होने के आसार हैं।

बसपा ने जाट समुदाय से आने वाले विनीत भराला को सरधना से अपना प्रत्याशी घोषित किया है। उनके मैदान में उतरने से सबसे बड़ा सवाल यह है कि बसपा का जाट कार्ड किसके चुनावी समीकरण को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगा।

BSP ने खेला जाट कार्ड

बसपा ने वलीदपुर क्षेत्र में आयोजित एक जनसभा में विनीत भराला को सरधना विधानसभा सीट से अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया। उम्मीदवार बनाए जाने के बाद विनीत भराला ने दावा किया कि उन्हें सरधना क्षेत्र के समाज के हर वर्ग का समर्थन मिलेगा।

विनीत भराला का पूरा नाम विनीत चौधरी बताया जाता है। वह सरधना के भराला गांव से ताल्लुक रखते हैं, जिसके कारण इलाके में उन्हें विनीत भराला के नाम से जाना जाता है।

उनकी उम्मीदवारी को बसपा की सामाजिक समीकरण साधने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

कौन हैं विनीत भराला?

विनीत भराला पहले समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वह कुछ समय पहले सपा छोड़कर बसपा में शामिल हुए थे। उनके पिता सत्यप्रकाश भराला सरधना क्षेत्र में सपा के वरिष्ठ नेता रहे थे और विधानसभा चुनाव भी लड़ चुके थे।

विनीत भराला लंबे समय से क्षेत्र की राजनीति में सक्रिय हैं। बताया जाता है कि वह सपा से चुनाव लड़ने की इच्छा रखते थे, लेकिन अतुल प्रधान के मौजूदा विधायक होने के कारण टिकट की संभावना कम होने पर उन्होंने बसपा का रुख किया।

संगीत सोम के सामने बढ़ी चुनौती

सरधना सीट पर संगीत सोम की मजबूत राजनीतिक पकड़ रही है। वह 2012 और 2017 में भाजपा के टिकट पर इस सीट से विधायक रह चुके हैं। हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्हें सपा के अतुल प्रधान से हार का सामना करना पड़ा था। अतुल प्रधान ने संगीत सोम को 18,200 वोटों के अंतर से हराया था।

अब 2027 से पहले संगीत सोम के सामने एक नया समीकरण बनता दिखाई दे रहा है। बसपा ने जाट समुदाय से आने वाले विनीत भराला को मैदान में उतारा है। ऐसे में जाट मतदाताओं का रुख चुनावी नतीजों पर असर डाल सकता है।

अतुल प्रधान के लिए भी आसान नहीं होगी राह

सरधना के मौजूदा विधायक अतुल प्रधान ने 2022 में भाजपा के संगीत सोम को हराकर बड़ा उलटफेर किया था। उस चुनाव में सपा-रालोद गठबंधन का भी उन्हें लाभ मिला था।

लेकिन मौजूदा राजनीतिक समीकरण 2022 से अलग हैं। रालोद अब भाजपा के साथ गठबंधन में है और बसपा ने जाट चेहरे को मैदान में उतारा है। ऐसे में अतुल प्रधान के सामने भी अपने पुराने सामाजिक और राजनीतिक समीकरण को बनाए रखने की चुनौती होगी।

सरधना में क्यों अहम हैं जाट वोट?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाट मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। Aaj Tak की रिपोर्ट के अनुसार सरधना विधानसभा क्षेत्र में करीब 50 हजार जाट मतदाता बताए गए हैं। इसके अलावा मुस्लिम, ठाकुर, गुर्जर और दलित मतदाता भी चुनावी परिणाम को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।

इसी वजह से बसपा का जाट उम्मीदवार उतारना सिर्फ उम्मीदवार बदलने की कवायद नहीं बल्कि चुनावी समीकरण को प्रभावित करने वाला कदम माना जा रहा है।

2012 और 2017 में संगीत सोम का दबदबा

संगीत सोम ने 2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों में सरधना सीट पर जीत हासिल की थी। राजनीतिक विश्लेषण में उनके चुनावी आधार में जाट और राजपूत मतदाताओं की भूमिका का उल्लेख किया जाता रहा है।

हालांकि 2022 में तस्वीर बदल गई। सपा के अतुल प्रधान ने संगीत सोम को हराकर सीट पर कब्जा किया। अब 2027 के चुनाव से पहले BSP की एंट्री ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।

जाट वोटों को लेकर क्यों बढ़ी हलचल?

सरधना में जाट वोटों को लेकर भाजपा के भीतर भी राजनीतिक खींचतान की चर्चा रही है। Aaj Tak की रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा नेता संजीव बालियान और संगीत सोम के बीच राजनीतिक मतभेदों ने भी पश्चिमी यूपी की राजनीति में जाट बनाम ठाकुर की चर्चा को हवा दी है।

हालांकि RLD के भाजपा के साथ गठबंधन से भाजपा खेमे को जाट समर्थन मिलने की उम्मीद है, लेकिन BSP के जाट प्रत्याशी के आने से यह समर्थन कितना बंटता है, यह चुनाव के दौरान महत्वपूर्ण सवाल रहेगा।

BSP की रणनीति क्या है?

सरधना में बसपा की रणनीति सिर्फ जाट मतदाताओं तक सीमित नहीं मानी जा रही। पार्टी दलित, मुस्लिम और जाट सामाजिक समीकरण के जरिए अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

बसपा इस सीट पर पहले भी जीत दर्ज कर चुकी है। 2007 में चंद्रवीर सिंह बसपा के टिकट पर सरधना से विधायक बने थे। इसलिए पार्टी के लिए यह सीट पूरी तरह नई जमीन नहीं है।

सरधना में बन रहा त्रिकोणीय मुकाबला

विनीत भराला की उम्मीदवारी के बाद सरधना का मुकाबला फिलहाल तीन प्रमुख चेहरों के इर्द-गिर्द दिखाई दे रहा है:

  • संगीत सोम — BJP
  • अतुल प्रधान — SP
  • विनीत भराला — BSP

इन तीनों नेताओं के अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक आधार हैं। इसलिए चुनावी नतीजे इस बात पर काफी निर्भर कर सकते हैं कि कौन सा उम्मीदवार अपने समर्थक वर्ग के साथ-साथ अन्य मतदाताओं को कितना जोड़ पाता है।

किसका गणित बिगाड़ सकते हैं विनीत भराला?

बसपा उम्मीदवार विनीत भराला के मैदान में आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनका प्रभाव भाजपा के संगीत सोम पर ज्यादा पड़ेगा या सपा के अतुल प्रधान पर।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि विनीत भराला जाट मतदाताओं में मजबूत पकड़ बनाने में सफल होते हैं तो इससे संगीत सोम के उस चुनावी समीकरण पर असर पड़ सकता है, जिसमें जाट और राजपूत मतदाताओं का समर्थन महत्वपूर्ण माना जाता है। दूसरी ओर, अगर बसपा का दलित-मुस्लिम-जाट समीकरण मजबूत होता है तो अतुल प्रधान के सामने भी चुनौती बढ़ सकती है।

हालांकि चुनाव अभी दूर है और उम्मीदवारों, गठबंधनों तथा स्थानीय मुद्दों में आगे बदलाव संभव हैं। इसलिए मौजूदा समीकरण को अंतिम चुनावी तस्वीर नहीं माना जा सकता।

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