सहारनपुर: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद के ध्वस्तीकरण को लेकर विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। अब इस मामले में जमीयत उलेमा-ए-हिंद भी सक्रिय हो गई है। दिल्ली से संगठन का एक प्रतिनिधिमंडल सहारनपुर पहुंचा और मस्जिद मामले की पैरोकारी कर रहे पूर्व सांसद एवं समाजवादी पार्टी नेता हाजी फजलुर रहमान से मुलाकात की। इस दौरान मामले के कानूनी और अन्य पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
जमीयत के प्रतिनिधिमंडल ने स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाने के बाद पूरे मामले की रिपोर्ट अपने दिल्ली स्थित मुख्यालय को देने की बात कही है। संगठन का कहना है कि रिपोर्ट और कानूनी सलाह के आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी। जरूरत पड़ने पर हाईकोर्ट का रुख करने की तैयारी भी है।
हाजी फजलुर रहमान से क्या हुई बातचीत?
जमीयत के प्रतिनिधिमंडल ने पूर्व सांसद हाजी फजलुर रहमान के आवास पर पहुंचकर उनसे मुलाकात की। बैठक में मस्जिद से जुड़े मामले, अब तक हुई कानूनी कार्रवाई और आगे के विकल्पों पर चर्चा हुई।
हाजी फजलुर रहमान के मुताबिक, प्रतिनिधिमंडल ने उनके अलावा मामले की पैरोकारी कर रहे अधिवक्ता नौशाद अली से भी बातचीत की। उन्होंने बताया कि जमीयत ने इस कानूनी लड़ाई में नैतिक समर्थन देने का भरोसा जताया है।
ट्रिब्यूनल की जगह जिला अदालत क्यों गए?
मामले को लेकर हाजी फजलुर रहमान ने बताया कि संबंधित पक्ष ट्रिब्यूनल नहीं गया क्योंकि वहां लंबे समय से जज के मौजूद नहीं होने की जानकारी थी। ऐसे में तत्काल राहत मिलने की संभावना कम मानी गई और जिला अदालत का रास्ता अपनाया गया।
उनके मुताबिक, जिला अदालत से मामले में ऐसा फैसला आने की उम्मीद नहीं थी जिससे मस्जिद पक्ष को नुकसान उठाना पड़े। अब आगे की कानूनी रणनीति पर नए सिरे से विचार किया जा रहा है।
जमीयत ने कार्रवाई पर उठाए सवाल
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन कासमी ने मस्जिद को हटाए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि कार्रवाई रात के अंधेरे में की गई और प्रभावित पक्ष को न्यायिक प्रक्रिया के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिला। उनका कहना है कि यदि बातचीत और कानूनी प्रक्रिया के लिए पर्याप्त समय दिया जाता तो मामले को अदालत के जरिए सुलझाया जा सकता था।
हालांकि, प्रशासन का पक्ष अलग है। अधिकारियों के मुताबिक मस्जिद को सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण माना गया था और कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया के बाद की गई। इससे पहले नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने संरचना को सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के रूप में माना था और संबंधित पक्ष पर ₹6.41 करोड़ का जुर्माना भी लगाया था।
अब हाईकोर्ट जा सकती है जमीयत
जमीयत के प्रतिनिधियों ने स्थानीय लोगों और मामले से जुड़े जिम्मेदार लोगों से जानकारी जुटाई है। इस पूरी जानकारी को दिल्ली स्थित संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों और कानूनी विशेषज्ञों के सामने रखा जाएगा।
इसके बाद यह तय किया जाएगा कि मामले में अगला कानूनी कदम क्या होगा। संगठन ने संकेत दिया है कि आवश्यकता पड़ने पर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।
क्या है पूरा सहारनपुर मस्जिद विवाद?
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को लेकर लंबे समय से कानूनी विवाद चल रहा था। प्रशासन का दावा था कि यह सरकारी जमीन पर अनधिकृत रूप से बनी थी। जुलाई 2026 में नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने इसे हटाने का आदेश दिया था। आदेश में 30 दिन के भीतर कब्जा हटाने और ऐसा नहीं करने पर प्रशासन द्वारा कार्रवाई करने की बात कही गई थी।
इसके बाद मस्जिद प्रबंधन की ओर से अदालत में चुनौती दी गई, लेकिन अपील खारिज होने के बाद सितंबर में प्रशासन ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। प्रशासन ने कहा कि कार्रवाई अदालत के आदेश के अनुसार की गई और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की गई थी।
वहीं, मस्जिद से जुड़े पक्ष ने कार्रवाई की प्रक्रिया पर सवाल उठाए और आगे कानूनी लड़ाई जारी रखने की बात कही है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से भी बढ़ा विवाद
मस्जिद गिराए जाने के बाद इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश की राजनीति भी गरमा गई। विपक्षी नेताओं ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए, जबकि सरकार और प्रशासन की ओर से इसे कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई कार्रवाई बताया गया।
इस बीच अब जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रतिनिधिमंडल के सहारनपुर पहुंचने से मामले को एक नया कानूनी और सामाजिक आयाम मिल गया है।