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सपा छात्र सभा के कार्यकर्ताओं के लिए बदला ड्रेस कोड, नीली शर्ट-पैंट या नीली जींस-टीशर्ट में दिखेंगे कार्यकर्ता; PDA फॉर्मूले को मजबूत करने की कोशिश

dbnadmin
DBN विशेष संवाददाता
8 September 2026 11:54 AM 1 मिनट पठन 6141 Views
सपा छात्र सभा के कार्यकर्ताओं के लिए बदला ड्रेस कोड, नीली शर्ट-पैंट या नीली जींस-टीशर्ट में दिखेंगे कार्यकर्ता; PDA फॉर्मूले को मजबूत करने की कोशिश

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी ने अपने संगठन को लेकर एक नया प्रयोग शुरू किया है। पार्टी की छात्र सभा के कार्यकर्ता अब सिर्फ सपा की पारंपरिक लाल पहचान में ही नहीं, बल्कि नीले रंग की ड्रेस में भी नजर आएंगे। छात्र सभा के लिए नीली शर्ट-पैंट या नीली जींस और नीली टी-शर्ट का ड्रेस कोड तय किया गया है।

यह बदलाव केवल संगठनात्मक ड्रेस तक सीमित नहीं माना जा रहा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में नीला रंग लंबे समय से दलित और आंबेडकरवादी राजनीति से जुड़ा रहा है। ऐसे में चुनाव से करीब एक साल पहले सपा का नीले रंग को अपने युवा संगठन की पहचान में शामिल करना राजनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

लाल टोपी के साथ अब नीली ड्रेस

समाजवादी पार्टी की पारंपरिक पहचान लंबे समय से लाल टोपी और लाल गमछे से जुड़ी रही है। अखिलेश यादव समेत पार्टी के कई नेता सार्वजनिक कार्यक्रमों में इस पहचान के साथ नजर आते रहे हैं।

लेकिन 31 अगस्त को लखनऊ में सपा के जिला और महानगर अध्यक्षों की बैठक के दौरान अखिलेश यादव खुद नीले गमछे में नजर आए थे। शिवपाल सिंह यादव भी उस दौरान नीले गमछे में दिखाई दिए। इसके कुछ ही दिनों बाद छात्र सभा की ड्रेस में नीला रंग शामिल किए जाने से इस बदलाव को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गईं।

नीला रंग क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में नीला रंग आम तौर पर बहुजन और दलित राजनीति से जोड़ा जाता है। बहुजन समाज पार्टी की राजनीतिक पहचान में भी नीला रंग प्रमुख रहा है। डॉ. भीमराव आंबेडकर और दलित आंदोलन से जुड़े प्रतीकों के कारण भी इस रंग का विशेष राजनीतिक अर्थ माना जाता है।

इसी वजह से सपा के छात्र संगठन में नीला रंग शामिल करने को सिर्फ ड्रेस में बदलाव के तौर पर नहीं देखा जा रहा। राजनीतिक जानकार इसे पार्टी के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को और मजबूत करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

2027 चुनाव में दलित वोट पर नजर?

समाजवादी पार्टी पिछले कुछ समय से PDA फॉर्मूले को अपनी राजनीति के केंद्र में रख रही है। पार्टी की कोशिश अपने पारंपरिक सामाजिक आधार के साथ पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के वोटरों को एक व्यापक राजनीतिक गठजोड़ में जोड़ने की रही है।

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीती थीं और राज्य में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाली पार्टी बनी थी। इसके बाद पार्टी की नजर अब 2027 के विधानसभा चुनाव पर है।

ऐसे में छात्र सभा के ड्रेस कोड में नीला रंग शामिल करना पार्टी की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें युवा और दलित मतदाताओं के बीच संगठन की मौजूदगी को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।

PDA में ‘D’ को मजबूत करने की कोशिश

अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले में ‘D’ का मतलब दलित है। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि दलित वोटरों के बीच अपनी पकड़ को केवल चुनावी नारों तक सीमित न रखकर संगठनात्मक स्तर पर भी मजबूत किया जाए।

नीली ड्रेस के जरिए छात्र सभा के कार्यकर्ताओं को एक अलग पहचान देने की कोशिश इसी दिशा में देखी जा रही है। खास तौर पर कॉलेजों और युवाओं के बीच एक स्पष्ट संगठनात्मक पहचान बनाने से पार्टी को अपने युवा नेटवर्क को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

युवा वोटरों पर भी फोकस

2027 के चुनाव में युवा मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सपा ने भी अपने विभिन्न युवा संगठनों को अलग-अलग पहचान देने की दिशा में काम शुरू किया है।

इनमें समाजवादी युवजन सभा, लोहिया वाहिनी, अंबेडकर वाहिनी और छात्र सभा जैसे संगठन शामिल हैं। पार्टी की कोशिश इन संगठनों की भूमिकाओं को ज्यादा स्पष्ट करने और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अलग-अलग स्तर पर अभियान चलाने की बताई जा रही है।

शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाएं और सरकारी स्कूलों की स्थिति जैसे मुद्दों को भी पार्टी युवाओं के बीच उठाती रही है। सपा ने सरकारी स्कूलों की स्थिति और स्कूल बंद होने के मुद्दे पर भी अभियान चलाया है।

क्या सपा BSP के राजनीतिक स्पेस में सेंध लगाएगी?

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी लंबे समय से दलित राजनीति की प्रमुख ताकत रही है। हालांकि हाल के चुनावों में उसका चुनावी प्रदर्शन कमजोर हुआ है।

2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में BSP को सिर्फ एक सीट मिली थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। इसके बावजूद उसका वोट आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और कई सीटों पर उसके वोट चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।

यही वजह है कि सपा के लिए दलित वोटरों के बीच अपनी पकड़ बढ़ाना 2027 के चुनावी समीकरण में महत्वपूर्ण हो सकता है।

सपा का लाल रंग खत्म नहीं होगा

हालांकि नीले रंग को शामिल करने का मतलब यह नहीं है कि सपा अपनी पारंपरिक लाल पहचान छोड़ रही है। पार्टी की मूल पहचान लाल टोपी और लाल रंग से जुड़ी रहेगी।

नई नीली ड्रेस खास तौर पर छात्र सभा के संगठनात्मक इस्तेमाल के लिए है। इस तरह सपा अपनी पुरानी पहचान को बनाए रखते हुए एक नए सामाजिक और राजनीतिक वर्ग तक पहुंच बनाने का प्रयास करती दिखाई दे रही है।

BJP ने साधा निशाना

सपा के इस कदम पर बीजेपी की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने इसे दलित वोटरों को आकर्षित करने की कोशिश बताया और आरोप लगाया कि सिर्फ रंग बदलने से राजनीतिक रिकॉर्ड नहीं बदलता। यह बीजेपी का राजनीतिक आरोप है, जिसे सपा की रणनीति पर उसकी प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।

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