प्रयागराज: दैनिक वेतन पर लंबे समय तक काम करने वाले कर्मचारियों के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी ने यदि वर्षों तक लगातार दैनिक वेतन पर सेवा दी और बाद में उसे नियमित किया गया, तो उस लंबी सेवा अवधि को केवल दैनिक वेतन या अस्थायी सेवा बताकर पेंशन के लाभ से बाहर नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने करीब 22 साल की दैनिक वेतन सेवा को पेंशन के लिए योग्य सेवा में शामिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें एकल पीठ के पेंशन संबंधी आदेश को चुनौती दी गई थी।
22 साल की सेवा को ‘कैजुअल’ नहीं कहा जा सकता
इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि यदि कोई कर्मचारी करीब 22 वर्षों तक लगातार काम करता रहा है, तो उसकी पूरी सेवा को केवल कैजुअल या अस्थायी बताना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने माना कि इतनी लंबी अवधि किसी व्यक्ति के कार्यकाल का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।
मामले में कर्मचारी ने वर्ष 1989 से 2011 तक दैनिक वेतन के आधार पर सेवा की थी। बाद में उसकी सेवा नियमित हुई। पेंशन तय करते समय दैनिक वेतन वाली अवधि को शामिल नहीं किया गया था, जिसके खिलाफ कर्मचारी ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
क्या था पूरा मामला?
मामला नगर पालिका कुशीनगर के कर्मचारी राम प्रसाद यादव से जुड़ा है। उन्होंने दैनिक वेतन के आधार पर लंबे समय तक काम किया था। नियमितीकरण के बाद जब पेंशन का सवाल आया तो उनकी पहले की दैनिक वेतन सेवा को पेंशन योग्य सेवा में शामिल करने को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
एकल पीठ ने मार्च 2022 में राम प्रसाद यादव की याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें पेंशन का लाभ देने का आदेश दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने इस आदेश को विशेष अपील के जरिए चुनौती दी।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अब सरकार की अपील को खारिज करते हुए एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा है।
सरकार की दलील पर कोर्ट का जवाब
राज्य सरकार की ओर से दैनिक वेतन की सेवा को पेंशन की गणना से अलग रखने की दलील दी गई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने कर्मचारी की लंबे समय तक चली सेवा को देखते हुए इस तरह की तकनीकी व्याख्या को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक लगातार काम करने के बाद नियमित हुए कर्मचारी की सेवा को केवल नियुक्ति की तकनीकी प्रकृति के आधार पर पेंशन के लिए नजरअंदाज करना उचित नहीं है।
हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी एक मामले में कहा है कि नियमितीकरण से पहले की कॉन्ट्रैक्ट, एडहॉक, दैनिक वेतन या वर्कचार्ज सेवा, परिस्थितियों के अनुसार, पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों के लिए क्वालिफाइंग सर्विस में शामिल की जा सकती है।
तीन महीने में पेंशन तय करने का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि कर्मचारी की 1989 से 2011 तक की दैनिक वेतन सेवा को पेंशन योग्य सेवा में जोड़ते हुए पेंशन का निर्धारण किया जाए।
कोर्ट ने इसके लिए तीन महीने की समयसीमा तय की है। साथ ही पेंशन से जुड़े बकाया लाभों का भुगतान करने का निर्देश भी दिया गया है।
दैनिक वेतन कर्मचारियों के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिन्होंने नियमित होने से पहले वर्षों तक दैनिक वेतन के आधार पर काम किया है।
अक्सर ऐसे कर्मचारियों की शुरुआती सेवा को नियमित सेवा से अलग माना जाता है। इसके कारण उनकी पेंशन योग्य सेवा कम हो सकती है। हाईकोर्ट के इस फैसले से यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि लंबे समय तक लगातार की गई सेवा को केवल नियुक्ति के स्वरूप के आधार पर पेंशन से बाहर किया जा सकता है या नहीं।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर दैनिक वेतन कर्मचारी को स्वतः पेंशन का लाभ मिल जाएगा। संबंधित कर्मचारी की सेवा, नियमितीकरण, लागू नियमों और मामले के तथ्यों के आधार पर पात्रता तय होगी।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया रुख से भी जुड़ा है मामला
दैनिक वेतन और पेंशन का मुद्दा हाल में सुप्रीम कोर्ट के सामने भी आया। सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2026 में कहा कि नियमितीकरण से पहले कॉन्ट्रैक्ट, एडहॉक, दैनिक वेतन या वर्कचार्ज के आधार पर की गई सेवा को पेंशन लाभ के लिए क्वालिफाइंग सर्विस में गिना जाना चाहिए, खासकर जब सेवा में कथित ब्रेक वास्तविक न होकर तकनीकी या प्रशासनिक प्रकृति के हों।
इस व्यापक न्यायिक रुख में यह बात सामने आती है कि लंबे समय तक वास्तविक सेवा देने वाले कर्मचारी को केवल तकनीकी आधार पर सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित करने को अदालतें गंभीरता से देख रही हैं।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने यूपी सरकार की विशेष अपील खारिज कर दी। अदालत ने माना कि लंबे समय तक की गई दैनिक वेतन सेवा को पेंशन योग्य सेवा से बाहर रखना उचित नहीं है और संबंधित कर्मचारी की 1989 से 2011 तक की सेवा को पेंशन निर्धारण में शामिल किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला लंबे समय तक दैनिक वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण राहत के तौर पर देखा जा रहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 22 साल तक लगातार सेवा देने वाले कर्मचारी की सेवा को महज ‘कैजुअल’ बताकर पेंशन के अधिकार से अलग नहीं किया जा सकता।
अब संबंधित कर्मचारी की पेंशन में उसकी दैनिक वेतन वाली सेवा को जोड़कर तीन महीने के भीतर पेंशन का निर्धारण और बकाया भुगतान किया जाना है।
नोट: पेंशन संबंधी लाभ प्रत्येक कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड और लागू नियमों पर निर्भर करते हैं। यह रिपोर्ट न्यायालय के फैसले और उपलब्ध रिपोर्टों पर आधारित है, व्यक्तिगत कानूनी सलाह नहीं।