प्रयागराज: आपराधिक मामलों की जांच को ज्यादा पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनिवार्य करने पर विचार करने का निर्देश उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को दिया है। कोर्ट का मानना है कि डिजिटल रिकॉर्डिंग से जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ सकती है और जमानत समेत दूसरी न्यायिक कार्यवाहियों में अदालत को भी मदद मिलेगी।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने 15 सितंबर 2026 को आगरा के एक दहेज संबंधी मामले में जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की। मामले में जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि पहली शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करते समय उसका ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड तैयार नहीं किया गया था।
क्या है पूरा मामला?
मामला आगरा के बसौनी थाना क्षेत्र में दर्ज एक दहेज से जुड़े आपराधिक केस का है। इस मामले में चंद्रकांता ने जमानत के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। सुनवाई के दौरान संबंधित जांच अधिकारी भी अदालत के सामने मौजूद था।
कोर्ट के सवालों पर जांच अधिकारी ने बताया कि BNSS की धारा 180 के तहत पहली शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करते समय उसकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की गई थी। इसके बाद जांच अधिकारी ने अदालत के सामने बिना शर्त माफी भी मांगी।
BNSS की धारा 180 में क्या है प्रावधान?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 180(3) के तहत जांच अधिकारी को गवाहों के बयान ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से रिकॉर्ड करने की अनुमति है। BNSS Rules, 2024 के Rule 20(1) में भी इस व्यवस्था का उल्लेख है।
हालांकि, अभी हर मामले में इस रिकॉर्डिंग को अनिवार्य नहीं किया गया था। उत्तर प्रदेश पुलिस के एक पुराने सर्कुलर में दुष्कर्म पीड़िताओं के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनिवार्य किया गया था, जबकि दूसरे मामलों में यह व्यवस्था वैकल्पिक थी।
रिकॉर्डिंग को लेकर हाईकोर्ट ने क्यों जताई चिंता?
हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें जांच अधिकारियों ने गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की।
अदालत के मुताबिक, कुछ मामलों में जांच अधिकारी इस सुविधा का इस्तेमाल नहीं करते ताकि बाद में उन पर यह आरोप न लगे कि गवाहों के बयान उन्होंने खुद तैयार किए हैं या FIR के आधार पर बयान लिख दिया गया है। कोर्ट ने इस स्थिति को जांच की पारदर्शिता के नजरिए से गंभीरता से लिया।
DGP को क्या निर्देश दिया गया?
अदालत ने उत्तर प्रदेश के DGP से कहा है कि BNSS की धारा 180 के तहत दर्ज होने वाले गवाहों के बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनिवार्य बनाने पर विचार किया जाए।
इसके साथ ही DGP को अदालत द्वारा बताए गए जांच संबंधी दिशा-निर्देश सभी जांच अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए भी कहा गया है। कोर्ट के अनुसार, रिकॉर्डिंग उपलब्ध होने से जमानत और अन्य न्यायिक कार्यवाहियों के दौरान अदालत के लिए संबंधित बयान की वास्तविक स्थिति समझना आसान हो सकता है।
जांच अधिकारियों को दिए गए कई दिशा-निर्देश
हाईकोर्ट ने सिर्फ ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को लेकर ही टिप्पणी नहीं की, बल्कि आपराधिक जांच की प्रक्रिया को लेकर कई दिशा-निर्देश भी बताए।
इनमें संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने के बाद घटनास्थल पर जल्द पहुंचना और शिकायतकर्ता तथा गवाहों के बयान बिना अनावश्यक देरी के दर्ज करना शामिल है। कोर्ट ने स्वतंत्र गवाहों के बयान दर्ज करने पर भी जोर दिया है।
अदालत ने यह भी कहा कि जहां संभव हो, बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग E-Sakshya App के माध्यम से तैयार की जाए और जरूरत पड़ने पर इसे संबंधित अदालत के सामने उपलब्ध कराया जा सके।
गंभीर अपराधों और यौन अपराधों को लेकर भी निर्देश
हाईकोर्ट ने कहा कि 10 साल या उससे अधिक की सजा वाले अपराधों तथा दुष्कर्म या यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता/गवाह के बयान को मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराने की प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। यौन अपराध के मामलों में पीड़िता का बयान उसकी सुविधा के अनुसार महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किए जाने की बात भी कही गई।
इसके अलावा अश्लील वीडियो से जुड़े मामलों में जरूरत पड़ने पर मोबाइल फोन को फोरेंसिक साइंस लैब भेजने और साइबर सेल की सहायता लेने, जबकि मामले में किसी व्यक्ति की लोकेशन या बातचीत महत्वपूर्ण होने पर कॉल डिटेल रिकॉर्ड यानी CDR जुटाने जैसे निर्देश भी दिए गए।
कोर्ट ने निष्पक्ष जांच पर दिया जोर
हाईकोर्ट ने जांच अधिकारियों की भूमिका को सिर्फ बयान लिखने तक सीमित नहीं माना। अदालत ने कहा कि जांच का उद्देश्य वास्तविक तथ्यों और सच्चाई तक पहुंचना होना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक कार्रवाई किसी निर्दोष व्यक्ति को परेशान करने का माध्यम नहीं बननी चाहिए। इसी वजह से अदालत ने जांच में निष्पक्षता, स्वतंत्र गवाहों और डिजिटल रिकॉर्डिंग जैसे उपायों पर जोर दिया है।