लखनऊ: गोंडा में एक व्यक्ति की कथित हिरासत में मौत के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के दो कर्मचारियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। आरोपी RPF सब-इंस्पेक्टर करण सिंह यादव और कांस्टेबल अमित कुमार यादव ने गोंडा की विशेष अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज कर दी गई थी।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला गोंडा के किंकी गांव निवासी 35 वर्षीय संजय कुमार सोनकर की कथित हिरासत में मौत से जुड़ा है।
अभियोजन के अनुसार, 28 सितंबर 2025 को गोंडा से गुवाहाटी जा रही एक मालगाड़ी से मोतीगंज रेलवे स्टेशन क्षेत्र के पास सरसों के तेल के छह टिन चोरी हो गए थे। चोरी की जांच RPF कर रही थी और इसी दौरान संजय कुमार सोनकर का नाम सामने आया।
एफआईआर में आरोप है कि 4 नवंबर 2025 को RPF कर्मी संजय को पूछताछ के लिए अपने साथ ले गए। उसी शाम करीब साढ़े चार बजे उसे आगे की जांच के सिलसिले में उसके गांव लाया गया और फिर वापस ले जाया गया। अगले दिन उसके भाई को बताया गया कि संजय का शव मुर्दाघर में रखा है। अभियोजन का आरोप है कि हिरासत के दौरान संजय के साथ मारपीट हुई, जिसके बाद उसकी मौत हो गई।
आरोपियों ने क्या दलील दी?
RPF के सब-इंस्पेक्टर करण सिंह यादव और कांस्टेबल अमित कुमार यादव ने आरोपों से इनकार किया है। उनकी ओर से अदालत में कहा गया कि उन्हें मामले में गलत तरीके से फंसाया गया है।
बचाव पक्ष ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि रिपोर्ट में जांघ के ऊपरी हिस्से पर चोट और दोनों घुटनों पर खरोंच के निशान दर्ज हैं, लेकिन ये चोटें मौत का कारण बनने वाली नहीं थीं।
वहीं, राज्य सरकार ने अग्रिम जमानत का विरोध किया और मामले की गंभीरता का हवाला दिया। सरकारी पक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की अग्रिम जमानत?
न्यायमूर्ति मनीष माथुर की पीठ ने दोनों की अलग-अलग आपराधिक अपीलों को खारिज कर दिया। दोनों अपीलें गोंडा की विशेष अदालत द्वारा 4 अगस्त 2026 को अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के खिलाफ दाखिल की गई थीं।
अदालत ने हिरासत में मौत के मामलों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने टिप्पणी की कि कोविड-19 महामारी खत्म हो चुकी है, लेकिन हिरासत में मौतों का सिलसिला थमता हुआ नहीं दिख रहा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि हिरासत में मौत के मामलों में सामान्य तौर पर पुलिसकर्मियों पर आरोपों का जवाब देने और परिस्थितियों को स्पष्ट करने का दायित्व होना चाहिए। इस मामले में अदालत के अनुसार, फिलहाल अपीलकर्ता उस जिम्मेदारी को पूरा करते हुए नहीं दिखे।