Punjab Assembly Election 2027: पंजाब की राजनीति में संगरूर विधानसभा सीट ऐसी सीट रही है जहां किसी एक दल का लंबे समय तक एकछत्र दबदबा नहीं रहा. कभी कांग्रेस ने यहां मजबूत पकड़ बनाई तो कभी शिरोमणि अकाली दल ने बाजी मारी. 2022 में आम आदमी पार्टी ने बड़े अंतर से जीत दर्ज कर इस सीट की राजनीतिक कहानी में नया अध्याय जोड़ दिया. अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सवाल है कि संगरूर में किस पार्टी की जमीन सबसे मजबूत है और क्या AAP अपना कब्जा बरकरार रख पाएगी? संगरूर सीट का सियासी इतिहास संगरूर विधानसभा सीट पंजाब की 108 नंबर विधानसभा सीट है और यह सामान्य वर्ग की सीट है. जिला प्रशासन के मुताबिक, संगरूर जिले में विधानसभा क्षेत्र 108-संगरूर शामिल है. पुराने चुनावी आंकड़े बताते हैं कि यह सीट लगातार राजनीतिक बदलाव देखती रही है. 1977 में जनता पार्टी के गुरदियाल सिंह जीते, जबकि 1980 और और 1985 में अकाली दल ने कब्जा जमाया. 1992 में कांग्रेस के जसबीर सिंह ने जीत हासिल की और 1997 में अकाली दल के रंजीत सिंह फिर विधायक बने. कांग्रेस और अकाली दल के बीच बदलता मुकाबला 2002 में कांग्रेस के अरविंद खन्ना ने बड़ी बढ़त के साथ जीत दर्ज की. इसके बाद 2007 में कांग्रेस के सुरिंदर पाल सिंह सिबिया विजयी रहे. 2012 में अकाली दल के प्रकाश चंद गर्ग ने कांग्रेस को हराकर सीट वापस हासिल की. 2017 में कांग्रेस के अरविंद खन्ना ने बड़ी बढ़त के साथ जीत दर्ज की. इसके बाद 2007 में कांग्रेस के सुरिंदर पाल सिंह सिबिया विजयी रहे. 2012 में अकाली दल के प्रकाश चंद गर्ग तीसरे स्थान पर रहे. 2022 में AAP ने पलट दिया पूरा समीकरण 2022 में संगरूर की राजनीति ने बड़ा मोड़ लिया. आम आदमी पार्टी के नरिंदर कौर भराज ने 74,851 वोट हासिल कर कांग्रेस के विजय इंदर सिंगला को 36,430 वोटों के भारी अंतर से हराया. भाजपा के अरविंद खन्ना तीसरे और अकाली दल के विनरजीत सिंह गोल्डी चौथे स्थान पर रहे. 2027 चुनाव में क्या होगा? 2027 में संगरूर में मुकाबला दिलचस्प रहने की संभावना है. AAP के सामने अपनी मौजूदा बढ़त और सरकार के प्रदर्शन को वोट में बदलने की चुनौती होगी. वहीं कांग्रेस और अकाली दल के लिए यह सीट दोबारा मजबूत आधार बनाने का मौका होगी. भाजपा भी 2022 में हासिल वोटों के आधार पर अपना विस्तार करने की कोशिश कर सकती है. संगरूर का इतिहास यही बताता है कि यहां मतदाता किसी एक पार्टी के साथ स्थायी रूप से नहीं रहा है. 2027 में भी मुकाबला सिर्फ पार्टियों का नहीं, बल्कि बदलते जनमत और स्थानीय मुद्दों का इम्तिहान होगा.
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