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RLM के 3 विधायकों का पार्टी पर दावा:माधव आनंद ने कहा-पार्टी का फैसला उपेंद्र कुशवाहा को मानना होगा, परिवार से आगे नहीं सोचते

dbnadmin
DBN विशेष संवाददाता
7 October 2026 5:26 PM 1 मिनट पठन 2498 Views
RLM के 3 विधायकों का पार्टी पर दावा:माधव आनंद ने कहा-पार्टी का फैसला उपेंद्र कुशवाहा को मानना होगा, परिवार से आगे नहीं सोचते

विधान परिषद चुनाव में JDU के बाद अब राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) में विवाद शुरू हो गया है। उपेंद्र कुशवाहा की इच्छा के खिलाफ जाकर पार्टी के नेता रामपुकार सिन्हा ने सारण शिक्षक सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अपना नामांकन करा दिया है। सिन्हा को पार्टी के 4 में से 3 विधायकों का सपोर्ट है। केवल उपेंद्र कुशवाहा परिवार ने उन्हें कैंडिडेट बनाने का विरोध किया है। उपेंद्र कुशवाहा की तरफ से दावा किया गया है कि उनकी पार्टी NDA कैंडिडेट के साथ मजबूती से खड़ी है। वहीं दूसरी तरफ कुशवाहा के विधायकों की तरफ से दावा किया जा रहा है कि पार्टी ने लोकतांत्रिक तरीके से रामपुकार सिन्हा को अपना कैंडिडेट बनाया है। क्या 6 महीने के भीतर एक बार फिर से RLM टूट के कगार पर है? क्या 3 विधायक पार्टी पर कब्जा कर लेंगे? क्या उपेंद्र कुशवाहा परिवार से RLM के कार्यकर्ताओं में नाराजगी है? 6 पॉइंट में समझिए। 1- उपेंद्र कुशवाहा ने ही चुनाव की तैयारी करने के लिए कहा था RLM के फाउंडर और विधायक दल के नेता माधव आनंद से हमने रामपुकार सिन्हा के नॉमिनेशन को लेकर सवाल किए। उन्होंने दावा किया, ‘उपेंद्र कुशवाहा के कहने के बाद ही रामपुकार सिन्हा ने सारण शिक्षक सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू की थी। एक बार उन्होंने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को लेटर भी जारी करने के लिए कह दिया था। इसके बाद उन्होंने रुकने के लिए कहा।’ 2- परिवार की बात हो तो NDA में ऑल इज नॉट गुड हो जाता है माधव आनंद ने कहा, ‘जब परिवार को कोई पद देने की बात हो तो NDA में ऑल इज नॉट गुड (सबकुछ ठीक नहीं) हो जाता है। जब कार्यकर्ता को कोई पद देने की बारी आती है तो उसपर प्रशासनिक कार्रवाई करने की बात आ जाती है। ये गलत है। महीनों की तैयारी के बाद कोई कैसे वापस हो सकता है।’ उन्होंने कहा, ‘बतौर विधायक दल के नेता और शून्यकाल के सभापति होने के नाते मैं राज्यभर में घूम रहा हूं। पार्टी कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी है। कार्यकर्ताओं का गुस्सा अपने ही नेता से है। उनका कहना है कि केंद्र में न उपेंद्र कुशवाहा कुछ काम करवा रहे हैं और न राज्य में कैबिनेट मंत्री दीपक प्रकाश के होने के बाद भी कुछ काम हो रहा है। जिले में भी कुछ मान-सम्मान नहीं बच गया है।’ 3- अपना फ्यूचर सेट करने के लिए कार्यकर्ता को भूले पार्टी के तीनों विधायकों ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष पर गंभीर आरोप लगाए हैं। विधायकों ने बताया कि हम लोग सर्वसम्मति से रामपुकार सिन्हा को अपना कैंडिडेट बनाना चाहते थे। इनसे समर्थन देने के लिए कहा गया। लेकिन, उन्होंने सीधा मना कर दिया। इनका अपना कोई फ्यूचर डील बन गया होगा। इसके बाद ये कार्यकर्ता को भूल गए। डील क्या है? इस पर उन्होंने कहा कि ये कुछ भी हो सकता है, जो हमलोगों को मालूम नहीं। 4- विधायक ने नहीं, पार्टी ने रामपुकार सिन्हा को समर्थन दिया है माधव आनंद ने स्पष्ट कहा है कि विधान परिषद के चुनाव में पार्टी सिंबल नहीं देती है। पार्टी या गठबंधन कैंडिडेट को अपना समर्थन देती है। रामपुकार सिन्हा को केवल विधायक ने नहीं RLM ने अपना समर्थन दिया है। उन्होंने बताया, ‘4 विधायकों वाली पार्टी में 3 विधायक ने लोकतांत्रिक तरीके से निर्णय लिया कि पार्टी के कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान और प्रतिष्ठा के लिए इनकी लड़ाई लड़नी है। बागी वाली कोई बात ही नहीं है। यहां पार्टी ने निर्णय लिया है। पार्टी को बचाने के लिए यह फैसला लिया गया है। तीन विधायकों ने निर्णय लिया है तो राष्ट्रीय लोक मोर्चा का निर्णय है।’ RLM के इन तीन विधायकों में से आलोक सिंह इलेक्टेड प्रदेश अध्यक्ष हैं। माधव आनंद विधायक और पार्टी के विधायक दल के नेता और पार्टी के फाउंडर हैं। पार्टी के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव भी हैं। रामेश्वर महतो विधायक और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। 5- क्या विधायक बागी हो गए हैं? इस सवाल पर विधायकों ने बताया कि बागी वाली कोई बात नहीं है। पार्टी ने आपसी सहमति और लोकतांत्रिक तरीके से फैसला लिया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष की तरफ से कैंडिडेट उतारने से मना करने के सवाल पर उन्होंने कहा, ‘राष्ट्रीय अध्यक्ष भी पार्टी के संविधान के दायरे में हैं और उन्हें यह निर्णय स्वीकार करना होगा।’ 6- NDA से अलग होंगे या फ्रेंडली फाइट होगी? इस सवाल पर विधायकों ने बताया, ‘NDA के साथ थे, हैं और रहेंगे। केंद्र सरकार और बिहार सरकार को अनकंडिशनल सपोर्ट देते रहेंगे। फ्रेंडली फाइट हर चुनाव में होता रहा है। इसके बाद भी सब लोग साथ में रहे हैं। फ्रेंडली फाइट के बाद गठबंधन होता रहा है।’ ‘NDA का शीर्ष नेतृत्व अगर बात करता है और बैठाना चाहेंगे तब हम अपने कैंडिडेट को बैठाने के लिए तैयार हैं। शर्त बस इतना है कि लड़ाई में वही रहेंगे जिनके कैंडिडेट की जीत की संभावना ज्यादा रहेगी।’ विधायकों ने कहा, ‘हमको तो अपनी पार्टी भी बचानी है न। पार्टी तब बचेगी न जब कार्यकर्ता रहेगा। गठबंधन किसी का चेहरा देखकर नहीं होता है। जब कार्यकर्ता होते हैं, ताकत होती है तभी गठबंधन होता है।’ उपेंद्र कुशवाहा ने कहा- राजनीतिक वातावरण में नशा 5 अक्टूबर को उपेंद्र कुशवाहा पटना स्नातक और पटना शिक्षक सीट से NDA कैंडिडेट नीरज कुमार और नवल किशोर यादव के नॉमिनेशन में शामिल हुए थे। यहां जब इनसे पार्टी के भीतर बगावत का सवाल पूछा गया, तब उन्होंने कहा, ‘कोई बागी नहीं हुआ है। इस चुनावी राजनीतिक वातावरण में नशा घूम गया है। कोई भी उस नशा में मदहोश हो जा रहा है। यह सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों में है।’ 9 महीने में दूसरी बार पार्टी के भीतर नाराजगी सरकार गठन के बाद से ही उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के भीतर नाराजगी रह-रह कर सामने आ रही है। इससे पहले जनवरी में पार्टी के तीनों विधायक नाराज हो गए थे। उपेंद्र कुशवाहा की लिट्टी पार्टी छोड़कर दिल्ली में सीक्रेट मीटिंग की थी। उस वक्त उपेंद्र कुशवाहा डैमेज कंट्रोल करने में सफल रहे थे। इससे लिए दिनारा के विधायक आलोक सिंह को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। माधव आनंद को विधानसभा में पार्टी के विधायक दल के नेता की जिम्मेदारी थी। वहीं, बाजपट्टी विधायक रामेश्वर महतो को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। अब नाराजगी की वजह समझिए नई नाराजगी रामपुकार सिन्हा को भरोसा देकर सारण शिक्षक से कैंडिडेट नहीं बनाने के चलते सामने आई है। विधायकों ने गठबंधन से इस सीट की डिमांड करने की बात कही थी, लेकिन कुशवाहा ने ऐसा नहीं किया। इससे पहले उपेंद्र कुशवाहा ने चुनाव बाद आखिरी समय में अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री पद की शपथ दिला दी। दीपक किसी सदन के सदस्य नहीं थे। उपेंद्र कुशवाहा पहले से राज्यसभा सांसद हैं। राजनीति से दूर रहने वाली पत्नी को इस बार सासाराम से विधायक बनवा दिया। यही कारण है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी है। क्या टूट सकती है उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी? नियम के मुताबिक इसके लिए नाराज विधायकों के पास संख्या पर्याप्त है। अगर ये तीनों विधायक चाहें तो पार्टी छोड़कर दूसरे दल में जा सकते हैं। दल-बदल कानून के मुताबिक किसी पार्टी के कम-से-कम दो-तिहाई विधायक दूसरी पार्टी में जाने के पक्ष में हैं तो ऐसा कर सकते हैं। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा में फिलहाल 4 विधायक हैं। इस हिसाब से देखें तो 3 विधायक दो तिहाई के बराबर हैं। कुशवाहा का रिकॉर्ड- 20 साल में 3 नई पार्टी बनाई, 2 बार जदयू छोड़े बिहार की सियासत में उपेंद्र कुशवाहा की पहचान एक ऐसे नेता की है जो हर चुनाव से पहले अपना पाला बदल लेते हैं। वह 17 साल में तीन बार जेडीयू छोड़ चुके हैं। दो बार अपनी नई पार्टी बनाई। एनडीए और महागठबंधन के अलावा तीसरे मोर्चे का भी प्रयोग कर चुके हैं।

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