Wednesday, 30 September 2026
होम Health नकली दवाओं पर रोक जरूरी
Health

नकली दवाओं पर रोक जरूरी

dbnadmin
DBN विशेष संवाददाता
29 September 2026 9:26 PM 1 मिनट पठन 396 Views
नकली दवाओं पर रोक जरूरी

नकली दवाओं पर रोक जरूरी इलमा अज़ीम भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में जहां जन-कल्याण को शासन का मूलमंत्र माना जाता है, वहां स्वास्थ्य का क्षेत्र एक गंभीर संक्रमण काल से गुजर रहा है। बीमारियां जिस रफ्तार से बढ़ रही हैं, उससे कहीं अधिक तेजी से चिकित्सा के नाम पर इंसानी जिंदगियों से खिलवाड़ का एक भयावह और अनैतिक तंत्र विकसित हो चुका है। हाल ही में फार्मास्युटिकल क्षेत्र में मुनाफे की हवस और मरीजों के साथ हो रही धोखाधड़ी की गूंज देश की सबसे बड़ी अदालत में सुनाई दी है। न्याय के सर्वोच्च मंदिर ने दवा निर्माताओं, अस्पतालों और सरकारी नियामक संस्थाओं के रवैये पर जो तल्ख टिप्पणियां की हैं, उसने हमारे पूरे स्वास्थ्य तंत्र की रीढ़ को हिलाकर रख दिया है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ द्वारा एक मामले की सुनवाई के दौरान प्रयुक्त यह वाक्य- “यह तो सीधे तौर पर दिन-दहाड़े डकैती है”- महज एक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस लाचार भारतीय नागरिक की सामूहिक चीख का प्रतिनिधित्व करता है, जो बीमारी से पहले इलाज के खर्च और उसमें होने वाली जालसाजी से मर जाता है। न्यायालय के समक्ष जो तथ्य उभरकर सामने आए हैं, वे किसी भी संवेदनशील समाज को स्तब्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। खासकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे मरीजों के घावों पर जिस तरह मुनाफाखोरी का नमक छिड़का जा रहा है, वह अमानवीयता की पराकाष्ठा है। अदालत के संज्ञान में लाया गया कि कैंसर की एक आवश्यक जीवन रक्षक दवा, जिसकी कीमत निर्माता कंपनी द्वारा रिटेलर के लिए महज 2,700 रुपये तय की जाती है, उस पर अधिकतम खुदरा मूल्य पूरे 27,000 रुपये छाप दिया जाता है। यानी कि लागत और थोक मूल्य से ठीक दस गुना अधिक दाम पर उस दवा को बेचे जाने की खुली छूट दे दी गई। अदालत ने सीधे शब्दों में सवाल पूछा कि मरीजों को इस तरह बेदर्दी से लूटने की इजाजत व्यवस्था कैसे दे सकती है? यह मामला सिर्फ निजी क्षेत्र की लूट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के खजाने और टैक्सपेयर्स के पैसे में सेंधमारी का भी एक बड़ा घोटाला साबित हो रहा है। आज केंद्र सरकार ‘आयुष्मान भारत’, सीजीएचएस और डीजीएचएस जैसी लोक-कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से गरीब और मध्यम वर्ग के इलाज का खर्च उठाती है। निजी अस्पताल इन्हीं बढ़ी हुई और मनमानी एमआरपी पर दवाएं खरीदते हैं और बाद में सरकारी खजाने से उसका शत-प्रतिशत रीइम्बर्समेंट क्लेम करते हैं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि चंद दवा माफियाओं और निजी अस्पतालों की तिजोरियां भरने के लिए आम जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहाया जा रहा है। करदाताओं का पैसा जो देश के बुनियादी ढांचे और लोक-कल्याण में लगना चाहिए था, वह दवा कंपनियों की साठगांठ की भेंट चढ़ रहा है। एक तरफ जहां दवाओं के नाम पर यह संस्थागत और कानूनी लूट जारी है, वहीं दूसरी तरफ ‘नकली दवाओं’ का एक समानांतर और अंडरग्राउंड अंडरवर्ल्ड चल रहा है, जो सीधे मौत का व्यापार कर रहा है। इस घिनौने अपराध के तार कर्नाटक से लेकर हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र तक फैले हुए हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि नकली दवाओं का नेटवर्क देशव्यापी नेटवर्क बन चुका है। कुछ समय पूर्व नागपुर के सरकारी अस्पताल में भी एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया था, जहां मरीजों को दी जाने वाली गोलियों में मुख्य औषधीय साल्ट की जगह साधारण टेलकम पाउडर भरा हुआ था। जब किसी मरीज को एंटीबायोटिक या कैंसर रोधी दवाओं के नाम पर टेलकम पाउडर या चाक की गोलियां दी जाएंगी, तो उसका ठीक होना तो दूर, बीमारी और अधिक आक्रामक होकर उसकी जान ले लेगी। अब जब पानी सिर से ऊपर जा चुका है, तो अदालती हस्तक्षेप ही एकमात्र उम्मीद बची है। अदालतों में दायर हालिया याचिकाओं में यह मांग बिल्कुल जायज है कि नकली और अत्यधिक महंगी दवाओं के मामलों की जांच के लिए तीन महीने की सख्त समय-सीमा तय हो और फास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से एक वर्ष के भीतर दोषियों को फांसी या उम्रकैद जैसी नजीर बनने वाली सजाएं दी जाएं।

Source: Read Full Article

प्रतिक्रिया दें (Leave a Reply)

आपका ईमेल पता सुरक्षित है और प्रकाशित नहीं किया जाएगा। आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *