दलीय बगावत की यह तपिश किसी एक इलाके तक सीमित नहीं है। एक खास विचारधारा का अभेद्य गढ़ समझे जाने वाले मानसरोवर के रिहायशी इलाकों से लेकर इसके ठीक उलट शहर के पुराने, अंदरूनी परकोटे के तंग गली-मोहल्लों तक में यही रुझान साफ महसूस किया जा रहा है। दोनों छोरों पर कार्यकर्ता और मतदाता पार्टियों के अहंकार के खिलाफ एक ही सुर में खड़े दिख रहे हैं।
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