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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर मनचाही सरकारी जमीन नहीं मांग सकते, कब्रिस्तान की याचिका खारिज

dbnadmin
DBN विशेष संवाददाता
14 October 2026 11:10 AM 1 मिनट पठन 150 Views
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर मनचाही सरकारी जमीन नहीं मांग सकते, कब्रिस्तान की याचिका खारिज

Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता और सरकारी जमीन के आवंटन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय को धर्म की स्वतंत्रता के आधार पर अपनी पसंद की सरकारी जमीन पाने का कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने गाजियाबाद में ईसाई समुदाय के लिए कब्रिस्तान की जमीन आवंटित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है।

Amar Ujala

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क्या है पूरा मामला?

यह मामला उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले की मोदीनगर तहसील के विसोखर गांव से जुड़ा है। यहां लगभग 0.3420 हेक्टेयर बंजर जमीन को ईसाई समुदाय के कब्रिस्तान के लिए आवंटित करने की मांग की गई थी।

क्रिश्चियन कम्युनिटी वेलफेयर सोसाइटी ने प्रशासन से जमीन उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था। सोसाइटी का कहना था कि आसपास रहने वाले ईसाई समुदाय के लोगों को अपने धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

प्रशासन की ओर से मांग स्वीकार नहीं किए जाने पर मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा।

Amar Ujala

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हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने की।

अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में अपने धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करने की स्वतंत्रता शामिल हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी समुदाय को स्थानीय निकाय या ग्राम सभा की किसी विशेष जमीन को कब्रिस्तान के लिए आरक्षित कराने का कानूनी अधिकार मिल जाता है।

हाईकोर्ट के अनुसार, सरकारी जमीन को सार्वजनिक उपयोग के लिए निर्धारित करना प्रशासनिक निर्णय है। इसमें स्थानीय जरूरतों, व्यापक जनहित और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

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प्रशासन ने क्यों किया था जमीन देने का विरोध?

सुनवाई के दौरान प्रशासन ने अदालत के सामने कई तथ्य रखे।

  • संबंधित जमीन राजस्व अभिलेखों में बंजर भूमि के रूप में दर्ज है।
  • इस जमीन का पहले से कब्रिस्तान के रूप में उपयोग नहीं होता रहा है।
  • प्रशासन के अनुसार, क्षेत्र में पहले से एक ईसाई कब्रिस्तान मौजूद है।
  • नई जमीन आवंटित करने से स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिक मतभेद पैदा होने की आशंका जताई गई थी।

इन परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन ने संबंधित जमीन को कब्रिस्तान के लिए आवंटित करना उचित नहीं माना।

Amar Ujala

सरकारी जमीन के आवंटन पर प्रशासन का अधिकार

हाईकोर्ट ने कहा कि ग्राम सभा या स्थानीय निकाय की जमीन को किसी विशेष सार्वजनिक उद्देश्य के लिए निर्धारित करने का फैसला संबंधित अधिकारियों को करना होता है।

यदि किसी क्षेत्र में वास्तव में कब्रिस्तान के लिए पर्याप्त जगह नहीं है, तो प्रशासन ऐसी मांग पर परिस्थितियों के अनुसार विचार कर सकता है। हालांकि, किसी विशेष भूखंड के आवंटन को कानूनी अधिकार मानकर अदालत से उसे लागू कराने की मांग नहीं की जा सकती।

Jagran

इस टिप्पणी का अर्थ धार्मिक अंतिम संस्कार पर प्रतिबंध लगाना नहीं है। अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता और किसी खास सरकारी जमीन पर दावा करने के बीच अंतर स्पष्ट किया है।

धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक भूमि के बीच संतुलन

भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित है। हालांकि, धार्मिक अधिकारों का प्रयोग सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य संवैधानिक सीमाओं के अधीन होता है।

इस मामले में विवाद किसी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं को लेकर नहीं, बल्कि सरकारी जमीन के एक विशेष हिस्से को कब्रिस्तान के लिए आवंटित करने की मांग को लेकर था।

अदालत के निर्णय से यह सिद्धांत सामने आता है कि धार्मिक जरूरतों पर विचार करते समय प्रशासन को स्थानीय परिस्थितियों और सभी नागरिकों के व्यापक हितों के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए।

हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित जमीन को कब्रिस्तान के लिए आवंटित करने का आदेश देने का पर्याप्त कानूनी आधार नहीं है।

इसके बाद क्रिश्चियन कम्युनिटी वेलफेयर सोसाइटी की याचिका खारिज कर दी गई।

निष्कर्ष: इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता और सरकारी जमीन के आवंटन के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट करता है। अदालत ने माना कि धार्मिक परंपराओं का पालन करने की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे किसी विशेष सरकारी भूखंड के आवंटन का स्वतः अधिकार नहीं मिलता।

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