तारीख: 5 जनवरी 2005 वक्त: शाम के करीब 6 बजे जगह: भीम बांध, मुंगेर एक भयानक ब्लास्ट और मुंगेर के एसपी केसी सुरेंद्र बाबू के चीथड़े उड़ गए। मांस के टुकड़े पेड़ पर टंगे मिले, साथ में कई जवानाें की भी मौत हो गई। एसपी की हत्या क्यों की गई? हमले का पूरा प्लान कैसे बनाया गया? कैसे उनकी ही गाड़ी टारगेट की गई? बिहार फाइल्स में पढ़िए इस बर्बर हमले की पूरी कहानी। 4 जनवरी 2005 को लखीसराय जिला के अभयपुर स्टेशन पर नक्सलियों से जुड़े सामान मिले। कुछ संदिग्ध भी पकड़े गए। इनके पास से मिले एक बैग में एक स्कूल के पेपर थे। इसका कनेक्शन मुंगेर जिले के धरहरा थाना क्षेत्र के पैतरा गांव से था। उस वक्त लखीसराय के SP दो-तीन दिनों की छुट्टी पर गए थे। पड़ोसी जिला होने के कारण मुंगेर के SP केसी सुरेंद्र बाबू को तब तक के लिए लखीसराय SP का भी प्रभार मिला था। उस दौर में मुंगेर, लखीसराय और जमुई जिले पूरी तरह से नक्सल प्रभावित थे। 5 जनवरी 2005 को SP केसी सुरेंद्र एक बड़ी पुलिस टीम लेकर धरारा के पैतरा गांव में छापेमारी करने गए। कुछ घंटों की छापेमारी और पड़ताल के बाद पुलिस टीम खड़गपुर के भीम बांध इलाके से होते हुए वापस मुंगेर लौट रही थी। रास्ते में भीम बांध से पहले एक सरकारी गेस्ट हाउस था। यहां SP और पुलिस के जवानों ने खाना खाया। इसके बाद वहां से पूरी टीम निकली और भीम बांध के पास पहुंची। उस वक्त ठंड का मौसम था। घने पेड़-पौधे और पहाड़ों के बीच कच्ची सड़क का रास्ता था। एक साथ पुलिस की कई गाड़ियां चल रही थी। बीच में एक जिप्सी थी। जिसके अंदर अपने बॉडीगार्ड के साथ मुंगेर के SP केसी सुरेंद्र बाबू बैठे थे। पूरी कतार में सिर्फ इनकी ही गाड़ी नक्सलियों के निशाने पर थी। जमालपुर डीएसपी विनोद कुमार (तब जमालपुर पुलिस अनुमंडल था) की गाड़ी आगे चल रही थी। ठीक इनके ठीक पीछे मुंगेर SP की गाड़ी थी। भीम बांध इलाके में नक्सलियों ने लैंड माइन बिछा रखे थे। नक्सली जंगल में छिपकर पुलिस काफिले पर नजर रख रहे थे। देख रहे थे कि उनके लैंड माइन के ऊपर से कौन सी गाड़ी गुजर रही है। शाम के करीब 6 बजे जैसे ही SP की गाड़ी लैंड माइन के ऊपर पहुंची, नक्सलियों ने धमाका कर दिया। विस्फोट इतना जबरदस्त था कि SP की गाड़ी करीब 20 फीट ऊपर उछली। गाड़ी के परखच्चे उड़ गए। उसमें बैठे SP केसी सुरेंद्र बाबू, ड्राइवर, उनके बॉडीगार्ड सभी के शरीर के चिथड़े उड़ गए। मौके पर ही 6 लोगों की मौत हो गई। उनके शव के टुकड़े आसपास के पेड़ों पर टंग गए। लैंड माइन ब्लास्ट के बाद नक्सलियों ने पुलिस पर की फायरिंग जैसे ही धमाका हुआ, SP की जिप्सी के आगे और पीछे मौजूद पुलिस की गाड़ियां जहां थीं, वहीं रूक गईं। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वहां मौजूद दूसरे पुलिस अधिकारी हों या फिर जवान, सभी के होश उड़ गए थे। इनके सामने केसी सुरेंद्र बाबू और साथी जवानों की लाश बिखरी थी। घना जंगल और ऊपर से अंधेरा। पुलिस के जवान संभलते इससे पहले ही पहले से घात लगाए नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस के जवानों ने तुरंत मोर्चा लिया, अपने राइफल निकाले और नक्सलियों पर जवाबी फायरिंग की। जवाबी गोलीबारी देखकर नक्सली पीछे हट गए। खौफनाक था वो पूरा मंजर राणा गौरी शंकर मुंगेर के सीनियर जर्नलिस्ट हैं। अगले दिन 6 जनवरी 2005 की सुबह वह रिपोर्टिंग के लिए वारदात स्थल पर पहुंचे थे। उस वक्त की इनकी रिपोर्ट के अनुसार वहां का पूरा मंजर बेहद खौफनाक था। लैंड माइन का ब्लास्ट कितना जोरदार था कि जिप्सी पूरी तरह से नष्ट हो गई थी। उसके कई हिस्से पास के पेड़ पर लटके दिखे थे। शहीद पुलिस वालों की लाश की हालत भी बेहद खराब थी। भीम बांध के जंगल से नक्सलियों के हमले में SP और 5 पुलिस जवानों के शहीद होने की खबर आग की तरह फैली। मुंगेर से लखीसराय और जमुई होते हुए जानकारी पटना तक पहुंची। इससे पुलिस मुख्यालय तक हलचल पैदा हो गई। शहीद जवानों के परिवार में कोहराम मच गया। हैदराबाद में केसी सुरेंद्र बाबू के परिवार तक जानकारी पहुंची तो वहां भी चीख-पुकार मच गई। रिटायर्ड पिता, बड़े और छोटे भाई, सभी का रो-रो कर हाल बुरा हो गया था। पोस्टिंग के 22वें दिन हो गए शहीद दिसंबर 2004 में बिहार सरकार ने पुलिस अधिकारियों का ट्रांसफर किया था। इसी क्रम में IPS केसी सुरेंद्र बाबू को मुंगेर का SP बनाया गया था। जिस दिन वो शहीद हुए, वो उनकी पोस्टिंग का महज 22वां दिन ही था। नक्सलियों का यह हमला बिहार पुलिस के लिए ब्लैक डे बन चुका था। इस खौफनाक वारदात की प्लानिंग तब के सबसे एक्टिव नक्सली संगठन भाकपा (माओवादी) ने की थी। इसके गुड़िल्ला दस्ते ने वारदात को अंजाम दिया था। अब केसी सुरेंद्र बाबू को जानिए केसी सुरेंद्र बाबू 1997 बैच के IPS ऑफिसर थे। मूल रूप से आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे। जिस वक्त घटना हुई उनके रिटायर पिता और भाई समेत पूरा परिवार हैदराबाद में भेल के MIG कॉलोनी में रह रहा था। इसी कॉलोनी में रहकर केसी सुरेंद्र बाबू ने भेल स्कूल से हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए वारंगल गए। वहां से पढ़ाई पूरी की। उनका सपना इंजीनियर नहीं, बल्कि एक अच्छा पुलिस ऑफिसर बनने का था। कड़ी मेहनत कर अपने इस सपने को उन्होंने पूरा किया था। UPSC की परीक्षा पास कर वो IPS अधिकारी बने थे। उन्हें बिहार कैडर मिला था। 7 जनवरी 2005 को हैदराबाद से पब्लिश अंग्रेजी अखबार ‘THE HINDU’ की एक रिपोर्ट के अनुसार बात केसी सुरेंद्र बाबू के स्टूडेंट लाइफ की है। एक बार हैदराबाद में वह फिल्म देखने गए थे। फिल्म खत्म होने तक रात हो चुकी थी। सिनेमा हॉल से घर लौट रहे थे तभी पुलिस की पेट्रोलिंग टीम ने रोका और रामचंद्रपुरम थाना ले गई। उस समय इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। यह घटना उनकी लाइफ का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बनी। इस घटना का जिक्र परिवार के लोगों ने ‘THE HINDU’ की टीम से तब किया था, जब केसी सुरेंद्र बाबू के शहीद होने की खबर मिली थी। परिवार के एक सदस्य ने सिनेमा हॉल से लौटने वाली घटना को याद करते हुए बताया था कि पुलिस ने उस दिन परेशान किया तो उन्होंने टॉप पुलिस अधिकारी बनने की कसम खाई थी। भारतीय पुलिस सेवा की नौकरी में आने के महज 8वें साल में ही वह शहीद हो गए। पहचान नहीं होने के कारण छूट गए थे तीन नक्सली वारदात के वक्त शिव कुमार सिंह यादव खड़गपुर थाना के प्रभारी थे। इनके बयान पर ही अज्ञात नक्सलियों के खिलाफ पुलिस ने FIR नंबर 4/05 दर्ज की थी। जिसके बाद जांच करते हुए पुलिस ने संदिग्ध राजकुमार दास, जमुई के सोनो थाना के भोलाराम और हरि ठाकुर को गिरफ्तार कर जेल भेजा था। करीब दो साल तक कोर्ट में सुनवाई चली। कुल 22 लोगों की गवाही हुई। इनमें 15 पुलिस वाले थे। गवाही देने वाले 5 डॉक्टर और दो आम लोग बाद में होस्टाइल हो गए। सभी ने घटना की पुष्टि तो की, लेकिन पकड़े गए संदिग्धों की पहचान नहीं कर पाए। इस वजह से कोर्ट ने जेल में बंद तीनों संदिगधों को छोड़ दिया। 2011 में री ओपेन हुआ केस शहीद पुलिस वालों के परिवार को इंसाफ न दिला पाना पुलिस मुख्यालय को काफी खल रहा था। 2011 में पुलिस मुख्यालय ने पूरे केस का रिव्यू किया। इसे फिर से खोलने का आदेश दिया। पुलिस कोर्ट पहुंची।
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