लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 10 राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। चुनाव में एक सीट के लिए करीब 37 प्रथम वरीयता वोटों की जरूरत है। ऐसे में भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों की नजर उन विधायकों पर है, जिनकी राजनीतिक स्थिति या आगामी 2027 विधानसभा चुनाव में टिकट को लेकर अनिश्चितता की चर्चा है। अमर उजाला की 3 अक्टूबर की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ऐसे विधायकों को अपने पक्ष में लाने के लिए आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट का संकेत दिए जाने की कोशिश हो रही है। हालांकि, किसी विधायक को राज्यसभा चुनाव में समर्थन के बदले टिकट देने की कोई औपचारिक घोषणा सामने नहीं आई है।
10 सीटों पर 16 अक्टूबर को होगा मतदान
निर्वाचन आयोग ने उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव कार्यक्रम घोषित किया है। मतदान 16 अक्टूबर 2026 को होगा। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 6 अक्टूबर है, जबकि नाम वापसी 9 अक्टूबर तक की जा सकती है। मतदान के बाद उसी दिन मतगणना होगी।
राज्यसभा चुनाव में विधायक सीधे किसी एक उम्मीदवार को सामान्य बहुमत के आधार पर वोट नहीं देते। यहां एकल संक्रमणीय मत यानी Single Transferable Vote प्रणाली का इस्तेमाल होता है। मौजूदा विधानसभा संख्या के आधार पर एक उम्मीदवार के लिए करीब 37 प्रथम वरीयता वोट जरूरी हैं।
भाजपा के पास सात सीटों के लिए पर्याप्त संख्या
उत्तर प्रदेश विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों के अनुसार भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास बड़ी संख्या में विधायक हैं। Amar Ujala की 3 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक सात सीटों के लिए सत्तारूढ़ गठबंधन के पास पर्याप्त संख्या है, जबकि समाजवादी पार्टी दो सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत मान रही है। इसके बाद बचने वाली सीट के लिए दोनों पक्षों के बीच संख्या जुटाने की कोशिश महत्वपूर्ण हो जाती है।
अमर उजाला की रिपोर्ट में सात विधानसभा सीटें रिक्त होने के बाद सदन की प्रभावी संख्या 396 बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार भाजपा के 255, अपना दल (सोनेलाल) के 13, राष्ट्रीय लोकदल के 9, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायक हैं। इसके अलावा जनसत्ता दल के दो और कुछ असंबद्ध विधायकों का समर्थन भी एनडीए के साथ माना गया है।
सपा के दो उम्मीदवार मैदान में
समाजवादी पार्टी ने राज्यसभा चुनाव के लिए रामगोपाल यादव और धनराज नथवानी को उम्मीदवार बनाया है। दोनों ने 30 सितंबर को नामांकन दाखिल किया था। पार्टी की ओर से तीसरा उम्मीदवार उतारने की संभावना भी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की 3 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, सपा सांसद वीरेंद्र सिंह ने तीसरा उम्मीदवार उतारने की बात कही है। हालांकि, अंतिम स्थिति नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
तीसरी सीट के लिए अतिरिक्त विधायकों की जरूरत
अगर सपा तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो उसे मौजूदा संख्या से अतिरिक्त विधायकों का समर्थन जुटाना होगा। Indian Express के विश्लेषण के अनुसार, तीसरे उम्मीदवार के लिए विपक्षी खेमे को अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ सकती है, जबकि भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को भी आठवीं सीट के लिए अतिरिक्त संख्या जुटानी होगी।
यही वजह है कि इस चुनाव में क्रॉसवोटिंग और विधायकों की प्राथमिकता अहम विषय बन गई है। पिछले राज्यसभा चुनाव में भी उत्तर प्रदेश में क्रॉसवोटिंग की चर्चा रही थी। इस बार दोनों प्रमुख दल अपने-अपने विधायकों और सहयोगी दलों के रुख पर नजर रख रहे हैं।
टिकट को लेकर विधायकों पर नजर
अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, भाजपा और सपा दोनों उन विधायकों को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं जिन्हें 2027 के विधानसभा चुनाव में टिकट को लेकर आशंका बताई जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ असंतुष्ट या अनिश्चित स्थिति वाले विधायकों को उनकी पसंद की सीट से आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट देने के संकेत दिए जाने की चर्चा है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि टिकट देने का फैसला संबंधित राजनीतिक दलों के स्तर पर बाद में आधिकारिक रूप से घोषित होता है। इसलिए मौजूदा समय में इसे राजनीतिक बातचीत और रिपोर्टों में सामने आए दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
सहयोगी दलों के विधायकों पर भी नजर
राज्यसभा चुनाव का गणित केवल भाजपा और सपा तक सीमित नहीं है। सहयोगी दलों के विधायक भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
3 अक्टूबर को सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि उनकी पार्टी के विधायक अब्बास अंसारी और जगदीश नारायण राय के सपा के पक्ष में जाने की संभावना है। राजभर के बयान के मुताबिक दोनों विधायक पहले सपा से जुड़े रहे हैं। अब्बास अंसारी की अखिलेश यादव से मुलाकात के बाद भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हुईं।
हालांकि, संबंधित विधायकों की ओर से इस रिपोर्ट में स्वतंत्र रूप से कोई टिप्पणी उपलब्ध नहीं थी। इसलिए उनके अंतिम मतदान रुख को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
भाजपा भी अपने विधायकों को लेकर सतर्क
सपा की ओर से तीसरे उम्मीदवार की संभावित एंट्री के बीच भाजपा के लिए भी अपने मौजूदा विधायकों और सहयोगी दलों को एकजुट रखना महत्वपूर्ण होगा। अमर उजाला की रिपोर्ट में भाजपा के कुछ ऐसे विधायकों का उल्लेख है, जिन्होंने पिछले राज्यसभा चुनाव में अलग रुख अपनाया था।
राज्यसभा चुनाव में मतदान की प्रक्रिया विधानसभा चुनाव से अलग होती है। इसलिए विधानसभा में पार्टी के समर्थन की संख्या और वास्तविक मतदान के समय विधायकों की प्राथमिकता में अंतर संभव है।
2027 विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में अहम है मुकाबला
राज्यसभा चुनाव ऐसे समय हो रहा है जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की राजनीतिक तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। यही कारण है कि वर्तमान विधायकों के भविष्य, संभावित टिकट और दल बदल की चर्चाओं को राज्यसभा चुनाव के साथ जोड़कर देखा जा रहा है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद सामने आएगा। अगर तीसरी सीट के लिए मुकाबला होता है तो दोनों खेमों को अतिरिक्त वोट जुटाने होंगे और सहयोगी दलों के विधायकों की भूमिका बढ़ सकती है।
16 अक्टूबर को साफ होगा तस्वीर का अगला चरण
उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होना है। उससे पहले 6 अक्टूबर तक नामांकन और 7 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी। 9 अक्टूबर तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकते हैं।
इसलिए आने वाले दिनों में उम्मीदवारों की अंतिम सूची, दलों का संख्या प्रबंधन और विधायकों के रुख पर राजनीतिक गतिविधियां केंद्रित रहेंगी। समर्थन के बदले टिकट देने की चर्चाओं की वास्तविक स्थिति भी आगे होने वाली राजनीतिक घोषणाओं और चुनावी प्रक्रिया से अधिक स्पष्ट होगी।