लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की तस्वीर फिलहाल बनी हुई है, लेकिन सीट शेयरिंग का फॉर्मूला अभी अंतिम रूप नहीं ले पाया है। दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या और विधानसभा क्षेत्रों के बंटवारे को लेकर चर्चा जारी है। इसी बीच दिल्ली में प्रस्तावित INDIA गठबंधन की बैठक को लेकर भी सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं।
Aaj Tak की रिपोर्ट के मुताबिक, समाजवादी पार्टी सीटों की संख्या से ज्यादा इस बात पर जोर दे रही है कि गठबंधन में जिस सीट की मांग की जाए, वहां उम्मीदवार की जमीनी पकड़ और चुनाव जीतने की क्षमता कैसी है। पार्टी की ओर से कांग्रेस के सामने संभावित उम्मीदवारों और पसंदीदा सीटों की जानकारी रखने की बात सामने आई है।
सीट शेयरिंग पर अखिलेश का ‘विनिबिलिटी’ फॉर्मूला
अखिलेश यादव पहले भी संकेत दे चुके हैं कि गठबंधन में सिर्फ सीटों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं होगी। उनके रुख के मुताबिक, सीट का फैसला इस आधार पर होना चाहिए कि वहां गठबंधन का उम्मीदवार चुनावी तौर पर कितना मजबूत है।
यानी सीट शेयरिंग में केवल यह नहीं देखा जाएगा कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिल रही हैं, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि संबंधित सीट पर कौन सा उम्मीदवार मैदान में उतरेगा और उसका स्थानीय आधार कितना मजबूत है।
कांग्रेस के सामने सपा की चार प्रमुख शर्तें
Aaj Tak की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सपा सीट शेयरिंग के दौरान कांग्रेस के सामने चार प्रमुख बिंदु रख सकती है।
1. संभावित उम्मीदवारों के नाम बताने होंगे
कांग्रेस जिन विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, वहां संभावित उम्मीदवारों के नाम भी सामने रखने की बात कही गई है। सपा उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और स्थानीय राजनीतिक स्थिति को सीट तय करने में महत्वपूर्ण मान रही है।
2. पसंदीदा सीटों की सूची देनी होगी
कांग्रेस को अपनी पसंद की विधानसभा सीटों की सूची भी देनी होगी। इससे दोनों दलों के बीच सीटों पर सीधे तौर पर चर्चा की जा सकेगी और यह तय किया जा सकेगा कि किस सीट पर किस पार्टी का दावा मजबूत है।
3. संबंधित क्षेत्र में जनाधार स्पष्ट करना होगा
सपा की ओर से यह सवाल भी उठाया जा सकता है कि कांग्रेस जिन सीटों पर दावा कर रही है, वहां उसका संगठन और राजनीतिक आधार कितना मजबूत है। यानी केवल सीट मांगने के बजाय उस क्षेत्र में पार्टी की मौजूदगी और समर्थन का आधार भी चर्चा का हिस्सा हो सकता है।
4. उम्मीदवार की जीत की संभावना पर जोर
सबसे महत्वपूर्ण बिंदु उम्मीदवार की चुनावी क्षमता से जुड़ा है। सपा का रुख है कि गठबंधन में ऐसी सीटों पर प्राथमिकता होनी चाहिए जहां संबंधित उम्मीदवार के पास चुनाव जीतने की पर्याप्त संभावना हो।
86 बनाम 105-115 सीटों का पुराना पेंच
सीट शेयरिंग को लेकर दोनों दलों के बीच अंतर पहले भी सामने आ चुका है। सितंबर की एक Aaj Tak रिपोर्ट के मुताबिक, सपा ने कांग्रेस के लिए 86 विधानसभा सीटों का प्रस्ताव रखा था, जबकि कांग्रेस 105 से 115 सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग कर रही थी। यह अंतिम समझौता नहीं था, बल्कि दोनों दलों की बातचीत में सामने आए शुरुआती प्रस्ताव और दावे थे।
सपा के 86 सीटों वाले प्रस्ताव का आधार 2024 लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को बनाया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस की जीती छह लोकसभा सीटों के अंतर्गत आने वाले विधानसभा क्षेत्रों में दो-दो सीटें और बाकी 74 लोकसभा क्षेत्रों से एक-एक विधानसभा सीट देने का फॉर्मूला बताया गया था। इस तरह 12 और 74 को जोड़कर 86 सीटों का आंकड़ा बनता है।
दूसरी ओर, कांग्रेस की ओर से 105 से 115 सीटों की मांग सामने आई थी। इसी अंतर की वजह से सीट शेयरिंग को लेकर बातचीत का एक बड़ा हिस्सा सीटों की संख्या के साथ-साथ यह तय करने पर भी केंद्रित है कि कौन-कौन सी विधानसभा सीट किस पार्टी के हिस्से में आएगी।
रायबरेली और अमेठी पर भी नजर
सीटों की कुल संख्या के अलावा रायबरेली और अमेठी क्षेत्र भी बातचीत में महत्वपूर्ण बताए जा रहे हैं। दोनों दलों के अपने-अपने राजनीतिक दावे और स्थानीय समीकरण हैं, इसलिए इन क्षेत्रों की विधानसभा सीटों को लेकर सहमति बनाना सीट शेयरिंग का अहम हिस्सा हो सकता है।
अखिलेश यादव ने 24 सितंबर को रायबरेली से PDA रथ यात्रा की शुरुआत भी की थी। इस दौरान उन्होंने गठबंधन जारी रखने की बात करते हुए सीटों के बंटवारे में जीत की क्षमता को आधार बनाए जाने की बात कही थी।
INDIA गठबंधन की बैठक में क्या होगा?
Aaj Tak की 28 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में होने वाली INDIA गठबंधन की बैठक के दौरान सपा-कांग्रेस सीट शेयरिंग पर चर्चा कर सकती हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अखिलेश यादव खुद बैठक में मौजूद न रहकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भेज सकते हैं।
ऐसे में बैठक में सीटों की संख्या के साथ-साथ संभावित उम्मीदवारों, पसंदीदा विधानसभा क्षेत्रों और स्थानीय राजनीतिक आधार पर चर्चा होने की संभावना बताई जा रही है।
दोनों दलों के सामने समझौते की चुनौती
सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर सहमति होने के बावजूद सीटों का बंटवारा आसान प्रक्रिया नहीं है। एक तरफ कांग्रेस अधिक विधानसभा सीटों पर अपना दावा रख रही है, वहीं सपा सीटों का फैसला उम्मीदवार और क्षेत्र की स्थिति को आधार बनाकर करने की बात कर रही है।
इसका मतलब यह है कि अंतिम समझौते में सिर्फ सीटों की संख्या ही नहीं, बल्कि सीटों की सूची और उम्मीदवारों की ताकत भी अहम भूमिका निभा सकती है।
फाइनल फॉर्मूले का अभी इंतजार
फिलहाल सपा-कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग का अंतिम और आधिकारिक फॉर्मूला घोषित नहीं हुआ है। सपा की ओर से ‘मजबूत उम्मीदवार’ और ‘जीत की संभावना’ पर जोर दिया जा रहा है, जबकि कांग्रेस अधिक सीटों पर अपना दावा रख रही है।
आने वाली बैठकों में यह स्पष्ट हो सकता है कि दोनों दल कुल कितनी सीटों पर सहमत होते हैं और रायबरेली-अमेठी समेत उन विधानसभा क्षेत्रों पर क्या फैसला होता है जहां दोनों की दावेदारी सामने आ रही है। अंतिम सूची और आधिकारिक घोषणा के बाद ही 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सपा-कांग्रेस गठबंधन का सीट शेयरिंग फॉर्मूला पूरी तरह स्पष्ट होगा।