लखीमपुर खीरी: उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के तिकुनिया में 3 अक्टूबर 2021 को हुई हिंसा को पांच साल पूरे हो गए हैं। इस मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई जारी है। पांच साल बाद भी यह मामला गवाहों की सुरक्षा, उनकी गवाही और मुकदमे की गति को लेकर चर्चा में है।
अमर उजाला की 3 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ित परिवारों की ओर से आरोप लगाया गया है कि सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव और कथित धमकियों के बीच आठ गवाह अपने पहले के रुख से पीछे हट चुके हैं। कुछ गवाहों के घर से बाहर नहीं निकलने और कुछ के क्षेत्र छोड़ने की बात भी सामने आई है। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष अदालत की कार्यवाही और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकलेगा।
क्या हुआ था तिकुनिया में?
3 अक्टूबर 2021 को लखीमपुर खीरी के तिकुनिया इलाके में किसानों का प्रदर्शन चल रहा था। इसी दौरान वाहनों के एक काफिले से किसानों के कुचले जाने की घटना सामने आई। इसके बाद इलाके में हिंसा भड़क गई।
इस पूरे घटनाक्रम में कुल आठ लोगों की मौत हुई थी। इनमें प्रदर्शन से जुड़े चार किसान और एक पत्रकार भी शामिल थे। बाद में भीड़ की हिंसा में तीन अन्य लोगों की मौत हुई।
घटना के बाद पुलिस ने अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की थीं। मुख्य मामले में आशीष मिश्रा और अन्य लोगों के खिलाफ हत्या समेत कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।
पांच साल बाद गवाहों को लेकर क्या सामने आया?
पीड़ित परिवारों का आरोप है कि मामले में गवाही देने वाले लोगों पर दबाव और सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं बनी हुई हैं। अमर उजाला की रिपोर्ट में आठ गवाहों के मुकरने का दावा किया गया है।
कुछ परिवारों ने आरोप लगाया कि जिन लोगों को पहले सुरक्षा मिली थी, उनकी सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव होने के बाद उन्हें अदालत में आने-जाने को लेकर चिंता है। एक अन्य गवाह के परिवार की ओर से भी सुरक्षा को लेकर परेशानी का उल्लेख किया गया है।
इन आरोपों पर लखीमपुर खीरी की पुलिस अधीक्षक डॉ. ख्याति गर्ग ने कहा कि अदालत के आदेशों के अनुसार गनर उपलब्ध कराए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी गवाह को सुरक्षा से संबंधित समस्या है तो पुलिस को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए। गनर के निलंबन को उन्होंने विभागीय और अनुशासन से जुड़ा मामला बताया।
सुप्रीम कोर्ट में भी उठा मामला
तिकुनिया हिंसा मामले की सुनवाई की गति और गवाहों से जुड़े मुद्दे पहले भी सुप्रीम कोर्ट के सामने उठ चुके हैं।
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे की धीमी गति पर चिंता जताई थी। अदालत के सामने रखी गई स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक उस समय मुख्य FIR 219/2021 में 36 गवाहों की गवाही हो चुकी थी, जबकि 10 को अदालत ने छूट दी थी और 85 गवाहों की गवाही अभी बाकी थी।
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि लगभग दो महीने तक ट्रायल कोर्ट में किसी गवाह की गवाही दर्ज नहीं हुई थी और मामले को तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत बताई थी।
गवाह को धमकी का मुद्दा भी सामने आया
इस मामले में गवाह को कथित धमकी दिए जाने का मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस से एक गवाह की शिकायत पर जांच करने को कहा था। गवाह ने आरोप लगाया था कि उसे मुकदमे में गवाही नहीं देने के लिए धमकाया गया।
सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल जज से संबंधित पीड़ित परिवारों की चिंताओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से रिपोर्ट मांगी थी। अदालत ने मामले में उठाई गई चिंताओं को देखने और आवश्यक कदम उठाने को कहा था।
सरकारी वकील को बदलने का भी निर्देश
सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को तिकुनिया हिंसा मामले की सुनवाई कर रहे सरकारी वकील को बदलने का निर्देश दिया था। यह निर्देश पीड़ितों की ओर से उठाई गई उन चिंताओं के बाद आया, जिनमें महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही आगे न बढ़ने का मुद्दा शामिल था। अदालत ने अनुभवी सरकारी वकील नियुक्त करने को कहा।
आरोपी पक्ष ने आरोपों को बताया गलत
पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी ने पीड़ित परिवारों की ओर से लगाए गए आरोपों को खारिज किया है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि आरोपों का जवाब अदालत में दिया जाएगा और मामला अदालत के सामने ही साबित होगा। उन्होंने चुनाव से संबंधित अपनी भविष्य की योजनाओं का भी उल्लेख किया।
अब आगे क्या?
तिकुनिया कांड की सुनवाई में अब गवाहों की सुरक्षा, लंबित गवाहियों और मुकदमे की गति महत्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं। पांच साल बाद भी मामला अदालत में लंबित है।
इस मामले में अलग-अलग पक्षों की ओर से कई आरोप और दावे सामने आए हैं। इसलिए अंतिम कानूनी निष्कर्ष अदालत के फैसले और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर ही तय होगा।